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बुधवार, 8 अप्रैल 2026

अप्रैल 08, 2026

मंडी में टूट गई किसान की सांसें: गेहूं की कम कीमत सुनते ही हार्ट अटैक

मंडी में टूट गई किसान की सांसें: गेहूं की कम कीमत सुनते ही हार्ट अटैक

कभी-कभी मौत अचानक नहीं आती, वह धीरे-धीरे बनती है—कर्ज की चिंता से, फसल की बर्बादी से, और उस उम्मीद के टूटने से जो किसान हर मौसम में बोता है। कोटा की भामाशाह मंडी में बुधवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक किसान की मौत नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की कहानी थी जो हर सीजन खेतों में शुरू होती है और कई बार मंडी में आकर टूट जाती है।




गांव झाड़आमली निवासी 54 वर्षीय किसान हंसराज वैष्णव सुबह करीब चार बजे पिकअप में गेहूं भरकर घर से निकले थे। उम्मीद थी कि आज मंडी में फसल बिकेगी तो कुछ कर्ज उतरेगा, घर का खर्च चलेगा और शायद थोड़ी राहत भी मिलेगी। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिख रखा था।



सुबह करीब 11 बजे जब वे मंडी यार्ड में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, तभी नीलामी में गेहूं की कीमत उम्मीद से बहुत कम लगी। बताया जा रहा है कि यह सुनते ही हंसराज गहरे तनाव में आ गए। कुछ ही देर बाद वे अचानक अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। आसपास मौजूद लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।



हंसराज वैष्णव की कहानी उन हजारों किसानों जैसी है जो अपनी छोटी जमीन के सहारे खेती नहीं चला पाते और फिर किराए पर जमीन लेकर खेती करते हैं। परिवार के अनुसार हंसराज के पास खुद की करीब चार बीघा जमीन थी, लेकिन उन्होंने इस बार दस बीघा जमीन लीज पर लेकर गेहूं की फसल बोई थी। खेती में उम्मीद बड़ी थी, लेकिन मौसम ने साथ नहीं दिया।



हाल ही में हुई बारिश और ओलावृष्टि ने गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा दिया। जो फसल बची, उसे बेचने के लिए वे मंडी पहुंचे थे। परिवार के भांजे प्रवीण के मुताबिक हंसराज पहले से ही आर्थिक दबाव में थे। पिछले साल सोयाबीन की फसल भी खराब हो गई थी और उनके ऊपर करीब आठ लाख रुपये का कर्ज हो गया था।



बेटे अजय के अनुसार पिता अक्सर कर्ज की चिंता में रहते थे। कई लोगों के उधार और खेती के खर्च ने उन्हें परेशान कर रखा था। मंडी में कम कीमत की खबर शायद उनके लिए आखिरी झटका साबित हुई।



अनंतपुरा थाना के एएसआई धमंडी लाल ने बताया कि किसान मंडी में फसल बेचने आए थे और वहीं अचेत होकर गिर गए। पोस्टमॉर्टम के बाद ही मौत का सही कारण सामने आएगा, लेकिन जो लोग उस वक्त वहां मौजूद थे, वे कहते हैं कि किसान की चिंता उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।



मंडी में ढेरियों के बीच एक किसान की जिंदगी चुपचाप खत्म हो गई। यह घटना सिर्फ कोटा की एक मंडी की नहीं है। यह उस सवाल की भी है जो हर साल फसल कटने के बाद उठता है। क्या किसान के हिस्से में सिर्फ मेहनत, मौसम का डर और बाजार की अनिश्चितता ही बची है? हंसराज वैष्णव सुबह उम्मीद लेकर मंडी पहुंचे थे। दोपहर होते-होते उनकी जिंदगी खत्म हो गई। पीछे रह गया एक परिवार, कर्ज का बोझ और वह सवाल जो हर किसान की आंखों में छुपा रहता है, क्या मेहनत की सही कीमत कभी मिलेगी?

बुधवार, 25 मार्च 2026

मार्च 25, 2026

धुरंधर 2 ने पाकिस्तान में मचा दी हलचल, अब भिखारियों में ढूंढे जा रहे 'भारतीय जासूस'

धुरंधर 2 ने पाकिस्तान में मचा दी हलचल, अब भिखारियों में ढूंढे जा रहे 'भारतीय जासूस'



कभी-कभी एक फिल्म सिर्फ पर्दे पर नहीं चलती, बल्कि सीमा पार तक हलचल मचा देती है। निर्माता-निर्देशक आदित्य धर की नई फिल्म “धुरंधर 2” के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। भारत में यह फिल्म सिनेमाघरों में चल रही है, लेकिन इसकी गूंज पाकिस्तान की गलियों तक सुनाई दे रही है। फिल्म रिलीज़ होते ही सोशल मीडिया पर एक अजीब किस्म की खबरें घूमने लगीं.. पाकिस्तान के कुछ इलाकों में भिखारियों को पकड़कर पूछताछ की जा रही है कि कहीं वे भारतीय जासूस तो नहीं! यह सुनने में भले ही फिल्मी लगे, लेकिन वहां की मीडिया और सोशल मीडिया चर्चाओं में यह बात बार-बार सामने आ रही है। कह सकते हैं कि धुरंधर 2 ने पाकिस्तान में एक नई बहस छेड़ दी है.. कहीं हर परछाईं में भारतीय जासूस तो नहीं छिपा?




आखिर फिल्म में ऐसा क्या है?

आदित्य धर की फिल्मों की पहचान ही यही है कि वे देश की सुरक्षा, खुफिया ऑपरेशन और आतंकवाद जैसे विषयों को सीधे तरीके से पर्दे पर लाते हैं। “धुरंधर 2” भी उसी शैली की फिल्म है। कहानी भारतीय खुफिया एजेंसियों के उन ऑपरेशनों के इर्द-गिर्द घूमती है जो सीमा पार से संचालित आतंकवादी नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश करते हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह आतंकवाद सिर्फ बंदूक से नहीं चलता, बल्कि उसके पीछे एक पूरा सिस्टम होता है। फंडिंग, ट्रेनिंग और राजनीतिक संरक्षण का। यही वह बात है जो फिल्म को सिर्फ एक्शन थ्रिलर नहीं रहने देती, बल्कि एक राजनीतिक बयान में बदल देती है।



पाकिस्तान में बेचैनी क्यों?

फिल्म में दिखाए गए कुछ दृश्य और संवाद पाकिस्तान में चर्चा का कारण बन गए हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि फिल्म ने जिस तरह पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर चोट की है, उसने वहां के कुछ हलकों को असहज कर दिया है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कहीं लोग इसे भारत का “साइकोलॉजिकल वारफेयर” बता रहे हैं, तो कहीं मजाक उड़ाते हुए कहा जा रहा है कि अब हर भिखारी में जासूस नजर आ रहा है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि जब कोई फिल्म किसी देश की संवेदनशील नस पर हाथ रखती है, तो प्रतिक्रिया होना तय है।



भारत में भी कम नहीं है बहस

दिलचस्प यह है कि भारत में भी फिल्म को लेकर राय एक जैसी नहीं है। एक वर्ग इसे साहसिक फिल्म मान रहा है, जो आतंकवाद की जड़ों पर सीधी चोट करती है। उनका कहना है कि अगर आतंकवाद एक वास्तविक समस्या है तो उसे दिखाना भी जरूरी है।दूसरी ओर कुछ लोग इसे प्रोपेगेंडा सिनेमा कह रहे हैं। उनका आरोप है कि फिल्म एक खास राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करती है और एक वर्ग की छवि खराब करती है। लेकिन फिल्म के समर्थकों का जवाब भी उतना ही सीधा है.. अगर कहानी सच के करीब है तो उसे दिखाने में हिचक क्यों?



बॉक्स ऑफिस और दर्शकों की जिज्ञासा

विवादों के बावजूद फिल्म ने दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा दी है। सिनेमाघरों में भीड़ और सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा यह बता रही है कि धुरंधर 2 ने लोगों को आकर्षित जरूर किया है। कई समीक्षकों ने फिल्म के निर्देशन, बैकग्राउंड स्कोर और एक्शन सीक्वेंस की तारीफ की है। वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि फिल्म कई जगह बहुत आक्रामक हो जाती है। लेकिन शायद यही उसकी ताकत भी है.. वह दर्शकों को तटस्थ रहने का मौका नहीं देती।



सिनेमा की ताकत

इतिहास गवाह है कि कई बार फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म देती हैं। धुरंधर भी शायद उसी श्रेणी में आ गई है। एक तरफ भारत में लोग इसे देशभक्ति और साहस की कहानी मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान में यह बेचैनी का कारण बन गई है। और जब किसी फिल्म पर इतनी प्रतिक्रियाएँ आने लगें, तो समझिए कि उसने कहीं न कहीं असर जरूर किया है।



सवाल यह नहीं है कि धुरंधर 2 सही है या गलत। असली सवाल यह है कि उसने जिस मुद्दे को उठाया है, वह कितना वास्तविक है। अगर एक फिल्म के बाद किसी देश में भिखारियों तक में जासूस ढूंढे जाने लगें, तो यह बताने के लिए काफी है कि सिनेमा कभी-कभी बंदूक से भी ज्यादा असरदार साबित हो सकता है। जय हिंद..

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

मार्च 20, 2026

“मैं थक गया हूं…” सुसाइड कर चुके एक रीजनल मैनेजर की यह कहानी अंदर तक झकझोर देगी

“मैं थक गया हूं…” सुसाइड कर चुके एक रीजनल मैनेजर की यह कहानी अंदर तक झकझोर देगी

सब कुछ था… फिर भी खत्म कर ली जिंदगी: जयपुर की यह चुप कहानी बहुत कुछ कहती है...




कभी-कभी जिंदगी बाहर से बिल्कुल ठीक दिखती है… अच्छी नौकरी, बड़ा पद, सम्मान, परिवार.. सब कुछ। लेकिन अंदर क्या चल रहा है, यह शायद कोई नहीं देख पाता। जयपुर के चित्रकूट इलाके में सामने आई एक खबर ने फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है। आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के रीजनल हेड अजय अरोड़ा ने अपने ही घर में फांसी लगाकर जीवन समाप्त कर लिया। कमरे में बेडशीट से बना फंदा… और पास ही एक सुसाइड नोट, जिसमें लिखा था, “मैं प्रोफेशनल लाइफ और फाइनेंशियल कंडीशन से थक गया हूं…”




बाहर से सफल… अंदर से थका हुआ इंसान


45 साल के अजय अरोड़ा, एक बड़ा नाम, एक जिम्मेदार पद, लेकिन शायद अंदर से एक बेहद थका हुआ इंसान। करीब एक साल पहले उनका ट्रांसफर जयपुर हुआ था। वह यहां अकेले रह रहे थे, जबकि उनकी पत्नी और बेटी उदयपुर में थीं। एक तरफ करियर की जिम्मेदारियां, दूसरी तरफ परिवार से दूरी, और ऊपर से फाइनेंशियल दबाव.. यह सब मिलकर शायद एक ऐसा बोझ बन गया, जिसे वह अब उठा नहीं पा रहे थे।



वो सन्नाटा, जो सब कुछ कह गया


शाम करीब 6 बजे, जब पड़ोसी किसी काम से उनके घर पहुंचे, तो दरवाजे के पीछे जो दृश्य था, उसने सब कुछ बदल दिया। पुलिस आई, जांच हुई, लेकिन कमरे का सन्नाटा सब कुछ कह चुका था। कोई शोर नहीं था, कोई संघर्ष नहीं दिखा.. बस एक फैसला, जो चुपचाप लिया गया।



सुसाइड नोट… और एक बड़ा सवाल


अजय अरोड़ा ने अपने सुसाइड नोट में साफ लिखा कि “मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करता हूं” “किसी का कोई कसूर नहीं है” “मैं किसी दबाव में नहीं हूं” यानी बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है। लेकिन असल सवाल यहीं से शुरू होता है.. अगर कोई दबाव नहीं था, तो फिर ऐसा क्या था जिसने एक सफल इंसान को यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? क्या हम “ठीक दिखने” को ही सच मान लेते हैं? आज के दौर में सबसे बड़ा संकट शायद यही है कि हम लोगों को उनके चेहरे से आंकते हैं, उनके हालात से नहीं। जो मुस्कुरा रहा है, वह जरूरी नहीं कि खुश भी हो। जो सफल दिख रहा है, वह जरूरी नहीं कि अंदर से संतुलित भी हो। कॉर्पोरेट दुनिया की चमक के पीछे कई बार थकान, अकेलापन और दबाव का अंधेरा छुपा होता है।



यह सिर्फ एक खबर नहीं, एक संकेत है


अजय अरोड़ा का जाना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, यह हम सबके लिए एक चेतावनी है। क्या हम अपने आसपास के लोगों को सच में समझते हैं? क्या हम उनकी थकान, उनके तनाव को महसूस कर पाते हैं? या सिर्फ उनकी “सक्सेस” देखकर संतुष्ट हो जाते हैं?



अंत में…

जिंदगी में समस्याएं हर किसी के पास होती हैं, लेकिन उनका अंत कभी समाधान नहीं होता। क्योंकि हर कठिन दौर के बाद एक नया रास्ता निकलता है कि जरूरत सिर्फ इतना है कि हम उस वक्त टूटने की बजाय किसी से जुड़ जाएं। कभी-कभी एक बातचीत, एक फोन कॉल, या एक “मैं तुम्हारे साथ हूं” किसी की पूरी जिंदगी बचा सकता है।

सोमवार, 16 मार्च 2026

मार्च 16, 2026

जब विदाई में छलक पड़े जज़्बात: बैंड-बाजे के साथ एसपी को किया विदा

जब विदाई में छलक पड़े जज़्बात: बैंड-बाजे के साथ एसपी को किया विदा

एसपी को विदा करने उमङा जनसमूह


नागौर। कभी-कभी किसी अधिकारी की विदाई सिर्फ एक औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि वह एक भावनात्मक पल बन जाती है। नागौर में ऐसा ही दृश्य तब देखने को मिला जब पुलिस अधीक्षक मृदुल कच्छावा का तबादला बीकानेर होने पर एसपी ऑफिस से लेकर उनके सरकारी आवास तक बैंड-बाजे के साथ उन्हें विदाई दी गई।



यह दृश्य सामान्य नहीं था। पुलिस विभाग के अधिकारी, जवान और आमजन साथ थे, बैंड की धुन बज रही थी और माहौल में एक अजीब-सी खामोशी और सम्मान दोनों साथ-साथ महसूस हो रहे थे। कई पुलिसकर्मियों की आंखों में नमी भी दिखाई दी। सात महीने के छोटे से कार्यकाल में ही उन्होंने अपने अधीनस्थों के बीच एक अलग पहचान बना ली थी।



इस विदाई के दौरान नव नियुक्त पुलिस अधीक्षक रोशन मीणा भी मौजूद रहे। लेकिन पूरे समारोह में चर्चा एक ही बात की थी कि आखिर सात महीने में ही ऐसा क्या हुआ कि नागौर को अपना सख्त एसपी विदा करना पड़ा?


सात महीने का कार्यकाल, लेकिन तेज़ पहचान


मृदुल कच्छावा जब नागौर आए तो उनके सामने एक चुनौतीपूर्ण जिला था। बजरी माफिया, खनन गिरोह और नशे का कारोबार लंबे समय से चर्चा में रहे थे। भरतपुर जैसे संवेदनशील इलाके में काम करने का अनुभव लेकर आए कच्छावा ने नागौर में आते ही संकेत दे दिया था कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने अपने नाम के अनुरूप अपराधियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। ऑपरेशन नीलकंठ के तहत जिले में ड्रग माफिया पर बड़ी कार्रवाई की गई। नशे के कारोबार पर लगातार नकेल कसने की कोशिशें हुईं।



माफियाओं पर सख्ती


नागौर में बजरी और अवैध खनन के मामले लंबे समय से पुलिस और प्रशासन के लिए चुनौती बने हुए थे। कच्छावा के कार्यकाल में इन पर भी लगातार कार्रवाई की गई। सिर्फ कार्रवाई ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक संदेश भी दिए गए। हाल ही में एक अपराधी को शर्मिंदा करने के लिए 25 पैसे का इनाम घोषित किया गया था, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पुलिस महकमे तक चर्चा बटोरी। इसके अलावा कई अपराधियों द्वारा अवैध तरीके से बनाई गई संपत्तियों पर भी बुलडोज़र चला। यह संदेश साफ था कि अपराध से अर्जित संपत्ति भी सुरक्षित नहीं है।



10 हजार किलो विस्फोटक की बरामदगी


उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित कार्रवाई हरसौर में 10 हजार किलो विस्फोटक की बरामदगी रही। इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक पकड़े जाने की घटना ने पूरे देश का ध्यान नागौर की ओर खींच लिया था। यह कार्रवाई बताती है कि पुलिस केवल छोटी-मोटी घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि बड़े नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी।



तबादले के पीछे की चर्चाएं


हालांकि प्रशासनिक तबादले सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन नागौर में मृदुल कच्छावा के तबादले को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कहा जा रहा है कि उनकी सख्त कार्यशैली से केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि कुछ राजनीतिक हलकों में भी असहजता थी। जानकारी यह भी सामने आई कि उनके कई फैसलों से विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ विधायक भी नाराज चल रहे थे। इसी बीच उनके तबादले की खबर आई और देखते ही देखते नागौर को नया पुलिस अधीक्षक मिल गया।



जश्न और जज़्बात – दोनों साथ


दिलचस्प बात यह रही कि जहां पुलिस महकमे में कई लोग भावुक होकर उन्हें विदा कर रहे थे, वहीं जिले के कुछ हिस्सों में उनके तबादले पर जश्न मनाए जाने की खबरें भी सामने आईं। यही लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबना भी है कि एक ही फैसले पर अलग-अलग भावनाएं।



सवाल जो रह गया


मृदुल कच्छावा का नागौर में कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उन्होंने अपने काम से यह दिखा दिया कि यदि इच्छाशक्ति हो तो सात महीने भी किसी जिले की पुलिस व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी होते हैं। अब सवाल यह है कि नागौर में शुरू हुई यह सख्ती क्या आगे भी जारी रहेगी या यह सिर्फ सात महीनों की एक छोटी-सी कहानी बनकर रह जाएगी?

क्योंकि कानून का असर तभी होता है, जब उसकी निरंतरता बनी रहे।

शनिवार, 14 मार्च 2026

मार्च 14, 2026

किराणा दुकान की आड़ में मौत का व्यापार: जब पूरा परिवार बन गया नशे का सौदागर

नशे का कारोबार: जब पूरा परिवार ही बन गया मौत का सौदागर

कहते हैं कि अपराध कभी अकेला नहीं आता। वह धीरे-धीरे इंसान की सोच, परिवार और आने वाली पीढ़ियों तक को अपने जाल में फंसा लेता है। नागौर जिले के डेह गांव से सामने आई एक घटना इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। यहां एक ऐसा परिवार सामने आया है, जिसने नशे को सिर्फ धंधा नहीं बल्कि जैसे अपनी विरासत बना लिया। घर का मुखिया पहले से ही ड्रग तस्करी के आरोप में जेल में है, लेकिन उससे सबक लेने के बजाय पत्नी और बेटे ने उसी रास्ते को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया।



एएनटीएफ और स्थानीय पुलिस ने जब दबिश दी, तो किराणा दुकान की आड़ में चल रहा यह काला कारोबार सामने आ गया। पुलिस ने मां-बेटे को गिरफ्तार कर उनके पास से 27.37 ग्राम अवैध एमडी और 50 हजार से ज्यादा की ड्रग मनी बरामद की।


किराणा दुकान… या मौत का अड्डा?
गांव में यशोदा की एक छोटी-सी किराणा दुकान थी। बाहर से देखने पर यह एक सामान्य दुकान लगती थी, जहां लोग नमक, तेल या रोजमर्रा का सामान खरीदने आते होंगे। लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा खतरनाक थी।
बताया जा रहा है कि यही दुकान नशे के आदी लोगों के लिए एमडी सप्लाई का केंद्र बन चुकी थी। दुकान केवल एक मुखौटा थी, जिसके पीछे युवाओं की जिंदगी बर्बाद करने वाला कारोबार चल रहा था।



यशोदा का बेटा संजय उर्फ पिंटू इस नेटवर्क को गांवों और ढाणियों तक फैलाने का काम करता था। पिता पहले से जेल में था, लेकिन परिवार ने उस रास्ते को छोड़ने की बजाय उसी पर आगे बढ़ने का फैसला किया।


अपराध की विरासत
इस पूरे मामले की सबसे चिंताजनक बात यह है कि यहां अपराध किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा। पिता संतोषराम पहले से ही तस्करी के मामलों में जेल में है। बेटा संजय ने पिता के जेल जाने के बाद धंधे की कमान संभाल ली।



मां यशोदा भी लालच के चलते इस काले कारोबार में शामिल हो गई।
यानी एक परिवार, जो समाज के लिए उदाहरण बन सकता था, वही नशे के जाल का केंद्र बन गया। एएनटीएफ को मुखबिर से सूचना मिली थी कि डेह गांव में बड़े स्तर पर नशे का कारोबार चल रहा है। पुलिस टीम जब संतोषराम के घर पहुंची तो गेट खुला मिला।
अचानक पुलिस को सामने देखकर मां-बेटे के चेहरे से रंग उड़ गया। तलाशी के दौरान कमरे से एमडी और नकद पैसे बरामद हुए। इसके बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।



असली सवाल: लालच इतना क्यों?
यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि समाज के सामने एक गहरा सवाल भी खड़ा करती है। क्या कुछ पैसों के लालच में इंसान इतना अंधा हो सकता है कि वह दूसरों के बच्चों की जिंदगी बर्बाद करने लगे?
नशा बेचने वाला शायद कुछ समय के लिए पैसे कमा लेता है, लेकिन वह भूल जाता है कि यह पैसा कभी सुख नहीं देता। अक्सर ऐसे रास्ते का अंत जेल, बदनामी और टूटे हुए परिवार के रूप में ही होता है।



समाज के लिए सबक
डेह गांव की यह घटना हमें कई बातें सिखाती है।
पहली बात—अपराध कभी समाधान नहीं होता।
दूसरी बात—नशे का कारोबार सिर्फ कानून का नहीं, समाज का भी दुश्मन है।
और तीसरी बात—जब परिवार गलत रास्ते पर चल पड़े, तो उसका असर पीढ़ियों तक जाता है।



आज जरूरत है कि समाज ऐसे मामलों पर सिर्फ खबर पढ़कर आगे न बढ़ जाए, बल्कि जागरूक बने। यदि कहीं भी नशे का कारोबार दिखाई दे तो उसकी सूचना तुरंत पुलिस को देनी चाहिए। क्योंकि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे समाज को खोखला कर देता है।

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

जुलाई 31, 2025

काली स्याही: सत्ता छिनने की खीज या जनता के नाम पर किया गया नया पाखंड?

काली स्याही: सत्ता छिनने की खीज या जनता के नाम पर किया गया नया पाखंड?



स्याही फेंकी गई, सभापति पर नहीं बल्कि उस लोकतंत्र पर जो पहले ही गुटबाजी, लालच और स्वार्थ के कीचड़ में डूब चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि नगर परिषद की बैठक में हंगामा क्यों हुआ। सवाल यह है कि इस हंगामे में सच्चा जन-हित कहां है?



जो साढ़े चार साल तक सत्ता के साथ रहकर तालियां बजा रहे थे, वो अचानक इतने ईमानदार कैसे हो गए? नगर परिषद की मौजूदा सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जब गिर गया, तो उसका जवाब 24 पार्षदों ने इस्तीफा देकर दिया। और जब वह भी राजनीतिक जंग नहीं जीत पाया तो बारी आई नाटकीय विरोध प्रदर्शन की यानि काली स्याही की। लेकिन काली स्याही की यह घटना एक बहुत बड़ा सवाल छोड़ गई है कि क्या यह स्याही वास्तव में जनता के दर्द की प्रतिध्वनि थी? या फिर वो सत्ता खो देने की खीज थी, जो अब बदले की भाषा में बाहर आ रही है?


 

जनता के लिए, या सत्ता की तिकड़म के लिए?

चार साल तक चुपचाप साथ चलने वाले पार्षदों को न कभी बोर्ड की कार्यशैली गलत लगी न कभी विकास योजनाओं पर सवाल उठे न ही कभी उन्होंने इस्तीफा देने की कोई नीयत दिखाई। तो अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि इस्तीफे भी हो रहे हैं, बैठक में हंगामे भी हो रहे हैं, और स्याही से "जनता के हित" की बातें भी उछाली जा रही हैं?



राजनीतिक स्वार्थ की चाल में फंसती शहरी व्यवस्था

नागौर नगर परिषद इस वक्त दो ध्रुवों में बंटी है। एक ओर सत्ता में बनी रहने की जिद, दूसरी ओर सत्ता हथियाने की हड़बड़ी! बीच में अगर कोई वाकई पिस रहा है तो वो है शहर का आम नागरिक, जिसने ना तो कभी स्याही फेंकी, ना हंगामा किया, बस उम्मीद की कि कोई उसका नाला, सड़क, या लाइट  का मामला सुलझा देगा।


वक्त है जनता की आंखों में झांकने का, ना कि स्याही फेंकने का, अगर विरोध करना है, तो सदन में शब्दों से करो। अगर विकास की चिंता है, तो कार्य से दिखाओ। अगर ईमानदारी से राजनीति करनी है, तो सत्ता में रहने के दौरान भी सवाल उठाओ, सिर्फ जब कुर्सी छिन जाए, तब नहीं।

गुरुवार, 17 जुलाई 2025

जुलाई 17, 2025

कांवड़ यात्रा: एक लोटा जल नहीं, करोड़ों दिलों की श्रद्धा है

कांवड़ यात्रा: एक लोटा जल नहीं, करोड़ों दिलों की श्रद्धा है


हर साल सावन आते ही देश की सड़कों पर केसरिया लहराने लगती है। नंगे पांव चलते, डमरू की धुन पर झूमते, हर हर महादेव के उद्घोष के साथ हज़ारों-लाखों कांवड़िए दिखते हैं। कोई उत्तर प्रदेश से, कोई राजस्थान से, कोई हरियाणा से। कोई मजदूर है, कोई छात्र, कोई बेरोज़गार, कोई नौकरीपेशा। इन सबके कंधे पर एक ‘कांवड़’ टंगी होती है। लेकिन असल में वह कांवड़ नहीं, उनकी श्रद्धा होती है।


लेकिन ज्ञान बांटने वालों की कमी कहां है?



हाल ही में कई लोगों ने सोशल मीडिया पर यह ज्ञान परोस दिया कि कांवड़ केवल गरीब व बेरोजगार युवा उठाते हैं। धर्म को रोजगार से जोड़ दो तो देश खुशहाल हो जाएगा। एक लोटा जल पास के शिवालय में चढ़ा दो, उतना ही फल मिलेगा। ये यात्रा केवल मन को भरमाती है, भोलेनाथ को नहीं। पहली नजर में यह बात ‘विचारशील’ लग सकती है, लेकिन असल में यह टिप्पणी ना केवल संवेदनहीन है, बल्कि शहर के ड्रॉइंग रूम में बैठकर गांव-देहात की भावनाओं पर ठहाका लगाने जैसी है।


 क्या आस्था की कोई आर्थिक हैसियत होती है?


कांवड़ उठाने वाला अगर बेरोज़गार है, तो यह कहना कि उसकी आस्था ग़लत है, क्या यह वैसा ही नहीं जैसे कोई भूखा आदमी मंदिर जाए और आप कहें कि पहले रोटी खा, फिर भगवान देख? यह वर्गभेद है, और उससे भी ज़्यादा श्रद्धा की अवमानना है। क्या आपने कभी यह सवाल उठाया कि VIP श्रद्धालु चार्टर्ड प्लेन से जाते हैं, सोने का मुकुट चढ़ाते हैं, तो क्या भगवान तभी प्रसन्न होते हैं? नहीं! धर्म, दौलत नहीं देखता, मन की धड़कन देखता है।


कांवड़ यात्रा कोई धार्मिक तमाशा नहीं


कांवड़ यात्रा भारत की उन चंद परंपराओं में से है जो खुद से बड़ा कुछ करने की भावना देती है। कोई भी इसे जबरदस्ती नहीं करता। न सरकार आदेश देती है, न कोई NGO पैकेज ऑफर करता है।

लाखों लोग खुद को तपाकर सैकड़ो किलोमीटर की यात्रा पर निकलते हैं। कोई ढोल बजाकर सेवा करता है, कोई रास्ते में ORS और जलेबी बांटता है। कोई छोटा बच्चा रास्ते में खड़े होकर “बोल बम” चिल्लाता है। क्या ये सब बेरोजगारी का प्रदर्शन है? या यह समाज का वह चेहरा है जो बिना किसी लोभ के, बिना किसी धार्मिक हिंसा के, प्रेम और निष्ठा से जुड़ा होता है?


धर्म को रोजगार से मत जोड़िए, सेवा से जोड़िए


जिसने कहा धर्म को रोजगार से जोड़ दो वो शायद भूल गया कि इस देश में धर्म रोजगार से नहीं, सेवा से जुड़ा है। कांवड़ यात्रा का हर दिन हज़ारों लोगों को सेवा का अवसर देता है। युवाओं को नशे से दूर, शरीर को संयम में और मन को अनुशासन में रखने का माध्यम बनता है। अगर सरकार चाहे तो इस यात्रा को सामूहिक मानसिक स्वास्थ्य अभियान या ड्रग-डि-एडिक्शन मूवमेंट की तरह भी प्रमोट कर सकती है लेकिन अफसोस, यहां कुछ लोग इसे बेरोजगारों का भ्रम कहकर खत्म करना चाहते हैं।


एक लोटा जल से ज्यादा जरूरी है एक भरपूर नजरिया


जिसे यह लगता है कि कांवड़ से कुछ नहीं होता, एक लोटा जल शिवालय में चढ़ा दो, उसे समझना चाहिए कि कांवड़ उठाना केवल जल चढ़ाने का कर्मकांड नहीं, एक आत्मिक अनुभव है। वो जल प्रतीक है उस समर्पण का जो इंसान शिव के आगे अर्पण करता है और उस यात्रा में वो खुद को तलाशता है। कांवड़ का रास्ता शिव तक नहीं, स्वयं तक जाता है।




अंत में: श्रद्धा को ना नापिए, ना तौलिए


आप कांवड़ यात्रा से सहमत न हों, यह आपका अधिकार है।लेकिन उसे नीचा दिखाना, श्रद्धा पर प्रश्नचिह्न लगाना, और गरीबों की आस्था को ‘बेरोजगारी का उत्सव’ कह देना यह उस भारत की आत्मा पर चोट है जो आज भी मंदिर की घंटियों में चैन ढूंढता है।कांवड़ केवल एक लोटा जल नहीं, करोड़ों दिलों की पुकार है। जो इसे नहीं समझे, उसे आलोचना नहीं। कुछ समय अकेले यात्रा करने की जरूरत है। शायद तब उसे ‘शिव’ भी मिल जाएं और ‘स्वयं’ भी।

शुक्रवार, 27 जून 2025

जून 27, 2025

अविश्वास का पटाक्षेप: 47 का दावा... 2 की हाज़िरी! कौन किसे बेवकूफ बना रहा था?

अविश्वास का पटाक्षेप: 47 का दावा... 2 की हाज़िरी! कौन किसे बेवकूफ बना रहा था? जहां राजनीति बोली.. 'मैं पहले ही कह चुका था!'



तो आखिरकार वही हुआ जो होना था, और जो Primo Post ने दो सप्ताह पहले अपनी कलम से साफ-साफ कह दिया था। अविश्वास प्रस्ताव गिर गया।और गिरा भी ऐसा कि उसमें उठने की भी गुंजाइश नहीं रही। आज सुबह 10 बजे से 11 बजे तक आयोजित हुई अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की बैठक। 60 में से निर्वाचित पार्षदों की जो अनिवार्य उपस्थिति होनी थी उसमें उपस्थित हुए केवल दो। बाकी? कहीं नहीं।



जिन 47 पार्षदों के नाम पर राजनीति की पूरी लकीर खींची जा रही थी, वो खुद लकीर के बाहर नजर आए।और इस अनुपस्थिति के साथ ही अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ़ एक काग़ज़ रह गया। वो काग़ज़ जो सत्ता के सामने फड़फड़ाया भी नहीं।


क्या यह अचानक हुआ? बिल्कुल नहीं।

Primo Post ने पहले ही संकेत दे दिया था कि बाड़ेबंदी में भरोसे की दीवारें दरक रही हैं' और 'बाड़ेबंदी एक जुआ है, आर या पार!' लेकिन जिनके पास पार्षदों की गिनती थी, उनके पास समर्पण की मानसिकता नहीं थी। सत्ता पक्ष के पार्षद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से मिले, और उस बैठक के बाद ही सब कुछ तय हो गया था। लेकिन विपक्ष शायद तब भी गिनती में उलझा हुआ था गणित में नहीं, ग़लतफहमी में।


सभापति ने निकाला विजय जुलूस और लोकतंत्र ने देखा कि चुप रहकर भी जीत हासिल की जा सकती है। जब पूरा विपक्ष आरोपों और आक्रोश में शब्द खर्च कर रहा था, तब सत्ता पक्ष चुपचाप शब्दों की थकान देख रहा था। और आज, उसी मौन की जीत हुई। क्योंकि उपस्थिति साबित करने की ज़रूरत नहीं पड़ी,



अनुपस्थिति ही पर्याप्त हो गई।सभापति, जिन पर तमाम आरोप थे, जिनके खिलाफ बगावत की हवा बनाई गई थी, आज उसी हवा को चीरते हुए विजय जुलूस में शामिल हुईं मुस्कुराती हुईं, नाचती हुईं।राजनीति में समय सबसे बड़ा रणनीतिकार होता है। जिन्होंने अविश्वास की नींव रखी थी, शायद उन्हें खुद अपने दल का विश्वास नहीं रहा।कुछ सत्ता से डरे, कुछ दुविधा में पड़े,



और कुछ ऐसे थे जो विरोध सिर्फ़ इसलिए कर रहे थे कि उन्हें विरोध करना आता था।Primo Post के पिछले कॉलमों में जो अनुमान थे वे आज परिणाम बनकर सामने आए।



राजनीति में भविष्यवाणी नहीं, फ़ील्ड विज़न काम आता है। 

जिसे विपक्ष सत्ता की पराजय समझ रहा था, वो भाजपा के लिए मात्र एक गणना थी कि किसे कब चुप कराना है, और किसे कब बोलने देना है।अविश्वास प्रस्ताव गिरा, लेकिन इसके साथ यह भी साफ हो गया कि राजनीति में संख्या नहीं, समय और संकल्प ज़्यादा निर्णायक होते हैं।


Primo Post जहाँ खबरें भविष्य बताने नहीं, भविष्य साबित करने के लिए लिखी जाती हैं।

शुक्रवार, 20 जून 2025

जून 20, 2025

एक डिनर की कीमत तुम क्या जानो पाकिस्तान वालों!

एक डिनर की कीमत तुम क्या जानो पाकिस्तान वालों!



जब मेज़ पर सिर्फ खाना न हो, बल्कि रणनीति परोसी जा रही हो तो हर निवाला सवाल बन जाता है, और हर तस्वीर सुर्खी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान आर्मी चीफ़ जनरल आसिम मुनीर के बीच हुआ हालिया डिनर, न तो कोई औपचारिक राज्य यात्रा थी, न ही कूटनीतिक मीटिंग का कोई आधिकारिक एजेंडा फिर भी, इस एक तस्वीर ने दुनिया के तमाम विश्लेषकों को चौंका दिया। ट्रंप मुस्कुरा रहे थे। मुनीर भी। लेकिन दोनों के चेहरे पर जो सबसे आम बात थी।वो था एक साझा उद्देश्य, जिसे अभी आधिकारिक शब्द नहीं मिले हैं मगर संकेत साफ हैं। डिनर की प्लेट में चुपचाप परोसी जा रही थी अमेरिका की ईरान नीति?



अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान अब भी ईरान की ओर हसरत भरी निगाहों से देखता है। तेल, सड़क, और रणनीतिक गहराई के लिहाज़ से। लेकिन ट्रंप भी वही हैं जिन्होंने बार-बार दिखाया है कि ईरान उनका पुराना इमोशनल शत्रु है, और राजनीतिक मोहरा भी। ऐसे में यह डिनर अचानक ही मध्य-पूर्व की नई बिसात बन गया। जहाँ ट्रंप ईरान के खिलाफ पाकिस्तान को एक सब-कॉन्ट्रैक्टेड रणनीतिक साझेदार की तरह देख सकते हैं। मुनीर को अमेरिका में बुलाना सिर्फ 'सम्मान' नहीं था, बल्कि शायद एक वार्म-अप मीटिंग थी। जिसमें तय किया जा रहा था कि आने वाले वक्त में पाकिस्तान कहां खड़ा होगा, जब ट्रंप और ईरान आमने-सामने होंगे।



पाकिस्तान की स्थिति: भूखा पेट, मगर बड़े-बड़े वादों के साथ

Imf के सामने कर्ज़ के लिए घुटनों पर खड़ा मुल्क, अपने प्रधानमंत्री को छोड़, सेना प्रमुख को कूटनीतिक मोर्चे पर आगे कर रहा है, क्योंकि वहां जानते हैं कि जहां रोटी नहीं मिलती, वहां मोहरे बनना पड़ता है। ट्रंप का ये डिनर शायद वही सौदा था जहाँ ईरान के खिलाफ एक पजामा-पहने सैनिक को सूट में सजाकर पेश किया गया।


भारत के लिए सबक क्या है?


भारत इस पूरी स्थिति को सिर्फ कूटनीतिक मनोरंजन की तरह नहीं देख सकता। पाकिस्तान-ईरान-अमेरिका की कोई भी नज़दीकी या सौदेबाज़ी, सीधे हमारे पश्चिमी सीमा समीकरणों को प्रभावित करती है। लेकिन भारत जानता है कि ट्रंप जैसे नेता स्थिरता नहीं, सौदा चाहते हैं। पाकिस्तान की हालत ऐसी है कि जो सौदा सस्ता हो, वो चाहे आत्मसम्मान का हो या संप्रभुता का वो भी कर लिया जाएगा।



सही मायने में यह सिर्फ एक डिनर नहीं था, यह पाकिस्तान के लिए अमेरिकी एजेंडे में घुल जाने का पहला कोर्स था। ट्रंप जानते हैं कि ईरान पर दबाव बनाने के लिए उनके पास हथियार हैं, लेकिन ज़मीन पर खेल खेलने वाले ‘मोहरों’ की जरूरत है। और पाकिस्तान, हमेशा की तरह, खुद को उसी के लिए उपलब्ध दिखा रहा है। आखिर, जब देश की विदेश नीति रावलपिंडी की कैंटीन में तैयार होती हो तो व्हाइट हाउस की टेबल पर बैठना कोई बड़ी जीत नहीं, एक बहुत बड़ा इशारा होता है तुम अब हमारे साथ हो, हमारे लिए हो।

गुरुवार, 19 जून 2025

जून 19, 2025

ज़िंदगी की पटरी से उतरते लोग और हम सब एक तरफ खड़े तमाशबीन!

ज़िंदगी की पटरी से उतरते लोग और हम सब एक तरफ खड़े तमाशबीन!



18 जून की सुबह और रात नागौर के रेल ट्रैक से दो खबरें गुज़रीं। दो जानें, दो फैसले, और एक शहर, जो कुछ पल को स्तब्ध हुआ और फिर रोज़मर्रा की रफ्तार में लौट गया। किसी ने कहा, "बहुत दुखद", किसी ने जोड़ा, "अब क्या करें..." लेकिन शायद किसी ने रुककर नहीं पूछा कि क्यों किया? उनके इस कदम ने समाज के सामने एक बार फिर वो आईना रख दिया है जिसमें हम सब की चुप्पी, असंवेदनशीलता और व्यस्तता स्पष्ट दिखती है। क्या अब ज़िंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि उसे एक ट्रेन की आवाज़ के साथ कुचल देना आसान लगने लगा है?



आज हम उस दौर में पहुंच चुके हैं जहाँ लोग ज़िंदगी से हार नहीं रहे, हम उन्हें हारने दे रहे हैं। कभी भावनात्मक टूटन, कभी पारिवारिक कलह, कभी आर्थिक दबाव। हर आत्महत्या की वजह अलग हो सकती है, लेकिन हर कहानी में एक चीज़ समान होती है और वो अकेलापन है। समाज में हम बात करते हैं आत्महत्या पर रोक की, पर हम रोकते किसे हैं? हमने अपने आसपास कितनों को सुना? कितनों के कंधे पर हाथ रखा?



किसी ने कहा कि थक गया हूँ और हमने जवाब में क्या दिया? "इतना भी क्या हो गया, सब झेलते हैं…" यही 'सब' दरअसल सबसे खतरनाक शब्द है, क्योंकि ये व्यक्ति को यह यकीन दिला देता है कि उसका दुख कोई मायने नहीं रखता। सवाल ये नहीं है कि क्यों दो लोगों ने ट्रेन के आगे जान दी।



सवाल यह है कि क्या हमने उन्हें कभी यह एहसास कराया था कि वो अकेले नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी व्यस्तता ने उनकी चुप्पी को और गहरा बना दिया? आत्महत्या कायरता नहीं है, यह एक थकी हुई चेतना का आखिरी चुप संवाद है, जो बोल नहीं पाती और इसलिए चुपचाप चली जाती है।


लेकिन असली कायरता शायद हमारी है, जो पास होते हुए भी कुछ नहीं कर पाते, जो पहचान होते हुए भी पहचानने से चूक जाते हैं। हमारा समाज अब हिम्मत का नहीं, ‘लाइक्स’ और ‘स्टेटस’ का समाज बन गया है। यहाँ लोग ज़िंदा रहने की नहीं, दिखने की लड़ाई लड़ रहे हैं।



किसी को सलाह देने में हम तेज़ हैं, लेकिन साथ देने में थके हुए। किसी को टूटता देखना अब खबर नहीं रहा बल्कि यह रूटीन बनता जा रहा है। यह रूटीन तब तक टूटेगा नहीं, जब तक हम हर टूटने वाले के पास रुककर यह न कहें कि मैं सुन रहा हूँ, तुम अकेले नहीं हो। इन दोनों आत्महत्याओं की रिपोर्ट दर्ज हो गई होगी, पोस्टमार्टम भी पूरा हो गया होगा, रेलवे ट्रैक भी साफ हो गया होगा... लेकिन क्या हमारा ज़मीर भी साफ है?



ज़रा सोचिए, कल आपके घर का, मोहल्ले का या सोशल मीडिया लिस्ट का कोई चुप इंसान कहीं बिना कुछ कहे गुम हो जाए तो क्या आप कह पाएंगे कि आपने उसे कभी रोकने की कोशिश की थी? मौत कभी समाधान नहीं होती। मगर हां, हमारी चुप्पी किसी की मौत का कारण ज़रूर बन सकती है।

बुधवार, 18 जून 2025

जून 18, 2025

कूटनीति के फॉर्मेट में विपक्ष की सियासत फिट नहीं होती!

कूटनीति के फॉर्मेट में विपक्ष की सियासत फिट नहीं होती!


मोदी और ट्रंप के बीच 35 मिनट की बातचीत क्या हुई  यह अब राजनैतिक बहस का नहीं, राजनीति का तमाशा बनता जा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने सरकार से पूछ लिया "क्या बात हुई, विस्तार से बताया जाए। सर्वदलीय बैठक बुलाओ। विपक्ष को भरोसे में लो।" यह मांग सुनने में लोकतांत्रिक लग सकती है, लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय मंचों और कूटनीति की हो, तो विपक्ष की यह ‘जिज्ञासा’ ज्यादा नहीं, बेअक्ली की हद तक जाती है।




राजनीति में सब कुछ बताया नहीं जाता, कूटनीति में बहुत कुछ छुपाया भी जाता है। 

दुनिया के किसी देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति स्तर की कूटनीतिक बातचीत को पब्लिक डोमेन में इस तरह खोलने की परंपरा नहीं है। क्यों? क्योंकि कूटनीति में हर शब्द का मतलब होता है, और हर चुप्पी का भी।


विपक्ष की यह अपेक्षा कि "ट्रंप और मोदी की बातचीत का पूरा ब्यौरा साझा किया जाए ना सिर्फ राजनयिक अनुशासन के विरुद्ध है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि या तो उन्हें कूटनीति की समझ नहीं है, या फिर देशहित से ऊपर राजनीति आ गई है।




सिर्फ पूछने के लिए सवाल मत पूछिए, जबाबदेही की मर्यादा भी समझिए


अंतरराष्ट्रीय संबंध कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं होते, जहाँ हर सवाल का उत्तर तुरंत और सार्वजनिक मिले। यह कई परतों वाला संवाद होता है, जहाँ कुछ शब्द भविष्य की ज़मीन तैयार करते हैं और कुछ चुप्पियाँ बहुत कुछ कह जाती हैं। विपक्ष जब इस पर प्रश्न खड़ा करता है,तो वह सरकार को नहीं, देश की विदेश नीति की साख को चुनौती देता है। क्या कांग्रेस चाहती है कि अमेरिका, चीन या पाकिस्तान इस बहस को यह कहकर इस्तेमाल करें: "भारत में खुद की सरकार पर भरोसा नहीं है, फिर हम भरोसा क्यों करें?"



ट्रंप कोई अदालत नहीं, न ही भारत कोई आरोपी है


कांग्रेस यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि सरकार कुछ छुपा रही है, कोई सौदा कर रही है।" यह वही पार्टी है जो अतीत में पाकिस्तान को बिरयानी भेजती रही, और अब ट्रंप की 35 मिनट की बातचीत को लोकतंत्र का टेस्ट बना रही है। सवाल यह नहीं है कि क्या बात हुई, सवाल यह है कि क्या विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय गरिमा का ध्यान है?



भारत की विदेश नीति संप्रभुता, स्थिरता और संप्रेषण की नींव पर टिकी है। उस पर पार्टी विशेष का टेम्पलेट लगाना राजनीतिक अपरिपक्वता है। विपक्ष को चाहिए कि वह आंतरिक राजनीति में जितनी उग्रता दिखाए, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उतनी ही गरिमा भी बरते। वरना अगली बार कोई भी राष्ट्रप्रमुख भारत से बात करने से पहले पूछेगा कि "आपके विपक्ष को भी भरोसा है क्या?"

शुक्रवार, 13 जून 2025

जून 13, 2025

क्या बाड़ेबंदी में भरोसे की दीवारें दरक रही हैं? या इस बार सभापति को हटाकर दर्ज कराएंगे इतिहास..

क्या बाड़ेबंदी में भरोसे की दीवारें दरक रही हैं? या इस बार सभापति को हटाकर दर्ज कराएंगे इतिहास..


नगर परिषद, नागौर, जहाँ पिछले कुछ महीनों से राजनीतिक अस्थिरता अनकही सरगोशियों में पल रही थी, वहाँ अब हालात बेकाबू घटनाओं की शक्ल में सामने आ चुके हैं। 60 सदस्यीय परिषद में 47 पार्षदों द्वारा सभापति के विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि अब शब्दों से आगे बढ़कर सियासत ने सीधे एक्शन मोड अख्तियार कर लिया है। लेकिन क्या यह संख्या अंत तक टिकेगी? क्या सत्ता पक्ष की रणनीति से विपक्षी एकता दरक सकती है? या यह बाड़ेबंदी असल में एक सामूहिक संकल्प की परीक्षा है?




27 जून: वोटिंग से पहले की लंबी रातें


जिला प्रशासन ने प्रस्ताव पर चर्चा के लिए 27 जून की तिथि निर्धारित की है। यह 15 दिन का अंतराल ही वह समय है जिसे लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल है।इतना वक्त विरोधी खेमे के लिए जितना सोचने का, उससे कहीं ज्यादा सत्ता पक्ष के लिए तोड़फोड़ करने का अवसर है। सूत्रों के मुताबिक, बाड़ेबंदी में अभी लगभग 40 पार्षद ही मौजूद हैं। कुछ की अनुपस्थिति ने स्वाभाविक संदेहों को जन्म दिया है। क्या टूट शुरू हो चुकी है? लेकिन विपक्षी खेमे के भीतर से मिली असली जानकारी, जो तस्वीर को पूरी तरह से पलट देती है।


बाड़ेबंदी या भरोसे की बुनियाद?


Primo Post को विपक्षी पार्षद खेमे के एक विश्वस्त सूत्र ने बताया है: "हम टूटने नहीं आए, तय करने आए हैं। सब अपनी मर्जी से यहीं हैं। कोई जबरदस्ती नहीं बल्कि पूरी रणनीति और लक्ष्य की स्पष्टता है। हम चाहते हैं कि सभापति को हटाने का निर्णय इतिहास में दर्ज हो और ये भी साफ लिखा जाए कि यह फैसला पार्षदों की सामूहिक चेतना का नतीजा था।" उनके अनुसार: सभी पार्षद संपर्क में हैं, फोन ऑन हैं और कुछ पार्षद तो वहीं रहकर सत्ता पक्ष के भीतर सेंध लगाने की कोशिश में भी जुटे हैं। यानी यह बाड़ेबंदी महज़ आत्मरक्षा नहीं, बल्कि सक्रिय रणनीतिक गतिविधि का केंद्र बन चुकी है।


सब्सीट्यूट सभापति: संभावित चाल


राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि DLB यानी नगर निकाय निदेशालय से वोटिंग के दिन सभापति को कार्यमुक्त कर कोई ‘कार्यवाहक सभापति’ नियुक्त किया जा सकता है। अगर यह चाल चली जाती है तो


1. विपक्षी एकता को नैतिक भ्रम में डाला जा सकता है,

2. किसी असंतुष्ट भाजपा पार्षद को कार्यवाहक बनाकर उसके जरिए खेमा तोड़ने की रणनीति पर काम हो सकता है।

यह ‘कुर्सी का मोह’ और ‘मान-सम्मान की तस्करी’ सत्ता पक्ष की परंपरागत शैली है, जिससे पार्षद बखूबी वाकिफ हैं।


सभापति का डांस वीडियो: प्रतीकों की राजनीति


इसी सब के बीच, सभापति का एक सार्वजनिक कार्यक्रम में डांस करते हुए वीडियो वायरल हुआ था। राजनीतिक प्रतीकों में यह वीडियो कोई साधारण दृश्य नहीं था यह या तो अति-आत्मविश्वास था, या जनभावनाओं से पूरी तरह विच्छिन्न सत्ता की एक झलक।


 राजनीतिक लड़ाई अब गिनती की नहीं, गरिमा की है

अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह संघर्ष केवल सभापति को हटाने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गरिमा और पार्षदों की सामूहिक इच्छाशक्ति को साबित करने का संग्राम बन चुका है।27 जून को नतीजा जो भी हो विपक्षी पार्षदों ने यह तय कर लिया है कि इस बार सत्ता का समीकरण वो नहीं, जनता तय करेगी।

बुधवार, 11 जून 2025

जून 11, 2025

"बाड़ेबंदी में बंद लोकतंत्र: 47 की ताक़त और फिर भी अनिश्चितता"

 "बाड़ेबंदी में बंद लोकतंत्र: 47 की ताक़त और फिर भी अनिश्चितता"


✍️ प्रवीण चौहान


नागौर नगर परिषद की राजनीति इन दिनों लोकतांत्रिक संकट के दौर से गुजर रही है। हालात इतने विस्फोटक हैं कि 47 पार्षदों ने मिलकर महिला सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दाखिल कर दिया है, जो कि परिषद के कुल 60 पार्षदों में दो-तिहाई बहुमत से भी अधिक है। फिर भी सियासी गलियारों में कोई भी इस प्रस्ताव के पार हो जाने की गारंटी नहीं दे पा रहा। क्यों?क्योंकि ये राजनीति है। और राजनीति में केवल संख्या ही नहीं, 'समय' और 'सत्ता' का भी बड़ा खेल होता है।

जिला कलेक्टर को अविश्वास प्रस्ताव सौंपते हुए पार्षद



वर्तमान सभापति सत्ता पक्ष से हैं और पद महिला आरक्षण के तहत है, इसलिए परोक्ष समर्थन सत्ता और प्रशासन, दोनों का ही बना रहना तय माना जा रहा है। ऐसे में बाड़े बंदी के बावजूद 90% आशंका जताई जा रही है कि कुछ पार्षद 'प्रशासनिक औपचारिकताओं' की आड़ में इधर से उधर किए जा सकते हैं। यह सब कुछ धीरे-धीरे और सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है।


बाड़ेबंदी कोई नई बात नहीं है, पर इसका स्थानीय राजनीति में प्रवेश इस बात का संकेत है कि अब नीचे तक लोकतंत्र में भरोसा कम और तिकड़म पर यकीन ज़्यादा हो चला है। अब सवाल यह नहीं रहा कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि कौन कितना 'मैनेज' हो सकता है।


पार्षदों का कहना है कि पूरे कार्यकाल में सभापति ने संवादहीनता, पक्षपात और निर्णयों में पारदर्शिता की कमी रखी। लेकिन यह सवाल भी मौज़ूं है कि इतने साल तक सभी पार्षद चुप क्यों रहे? और अब जब कार्यकाल का अंतिम साल शेष है, तो यह 'ईमानदारी की जागृति' कहीं किसी बड़े राजनीतिक समीकरण का हिस्सा तो नहीं?


आगे क्या हो सकता है?

अगर प्रशासन अविश्वास प्रस्ताव पर समय से कार्रवाई नहीं करता या जानबूझकर देरी करता है तो बाड़ेबंदी खुद ही कमजोर पड़ सकती है। पार्षदों को मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ सकता है। फोन कॉल, पारिवारिक दबाव, और 'विकास के नाम पर' भावनात्मक अपील- सब कुछ इस खेल का हिस्सा बनते हैं।


यह केवल नगर परिषद की लड़ाई नहीं है, यह पूरे लोकतंत्र की परीक्षा है, जहाँ संख्या, नीयत और रणनीति तीनों को एक साथ संतुलित करना होता है।


आज 47 पार्षद साथ हैं, लेकिन क्या कल भी होंगे? यही इस कथा का सबसे बड़ा क्लाइमैक्स है।

बुधवार, 29 जनवरी 2025

जनवरी 29, 2025

मजदूर डायरी के नाम पर दिनदहाड़े हुई लूट! मजदूरों के खून पसीने की कमाई आखिर कहां रखोगे?

मजदूर डायरी के नाम पर दिनदहाड़े हुई लूट!

मजदूरों के खून पसीने की कमाई आखिर कहां रखोगे?



नागौर। मंगलवार शाम 4:00 बजे एसपी बंगले के पीछे स्थित श्रम विभाग कार्यालय में काफी संख्या में मजदूरों की भीड़ हो हल्ला करती नजर आई। देखने पर माजरा समझ में आया कि बीकानेर के एक कथित एनजीओ के नाम से मजदूर डायरी बनाने के नाम पर धोखाधड़ी की गई। प्रत्येक मजदूर से ₹500 अवैध तरीके से वसूले गए। 


वसूली के लिए बाकायदा शहर की हर गली मोहल्ले में पिछले एक सप्ताह तक शिविर लगाया गया। पहले से ही बदनाम श्रम विभाग ने एनजीओ के प्रतिनिधियों को वसूले गए रुपए वापस करने का आदेश दिया। रुपए वापस देने की सूचना मिलते ही श्रमिकों की भीड़ लगातार बढ़ती गई। हालत बेकाबू हुए एनजीओ के प्रतिनिधि के पास पैसे खत्म हुए तो फरार हुआ। बात थाने तक पहुंची।


 शहर में एनजीओ द्वारा मजदूरों के साथ किया गया धोखाधड़ी का मामला बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। मजदूरों को मजदूर डायरी बनाने के नाम पर रुपए ठगना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह उनके अधिकारों का भी उल्लंघन है।


मजदूरों की मेहनत और पसीने से कमाई गई राशि को ठगना उनके साथ अन्याय है। यह मामला न केवल एनजीओ की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह हमारे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनैतिकता को भी उजागर करता है।


इस मामले में पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए और एनजीओ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, मजदूरों को उनकी राशि वापस दिलाने के लिए भी प्रयास किए जाने चाहिए।


यह मामला हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे समाज में ऐसे लोगों को कैसे रोका जा सकता है जो गरीब और कमजोर लोगों को ठगते हैं। हमें अपने समाज में जागरूकता फैलाने की जरूरत है और ऐसे लोगों के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है जो अनैतिक और अवैध गतिविधियों में शामिल हैं।

मंगलवार, 2 जुलाई 2024

जुलाई 02, 2024

नागौर शहर में मौत का पुलिया अब और कितनी जाने लगा? कार्रवाई होगी या फिर होगा नए हादसे का इंतजार!

नागौर शहर में मौत का पुलिया अब और कितनी जाने लगा? कार्रवाई होगी या फिर होगा नए हादसे का इंतजार!



नागौर। कल दिन भर में प्रदेश में हुए तीन हादसों ने आम आदमी को झकझोर दिया है। नागौर जिले में हुए दो हादसों में 6 लोगों की मौत और करौली हादसे में नौ लोगों की मृत्यु दुखद है। लेकिन नागौर शहर के खतरनाक पुलिया पर हुए हादसे की बात करें तो आम आदमी यही कह रहा है कि यह पुलिया मौत का पुलिया बन चुका है। इस पुलिया पर मात्र कुछ महीनो में ही पांचवा हादसा हुआ है। कल एक ही दिन में एक ही परिवार के चार जने मौत के मुंह में समा गए। 




  लगातार हादसों के बाद एनएच अथॉरिटी ने 30 किमी स्पीड का बोर्ड लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है। यह पुलिया गलत तरीके से विभिन्न खामियों के साथ बनाया हुआ है। पूल के दोनों तरफ सर्विस रोड भी सही नहीं है। सर्विस रोड से पुलिया पर चढ़ने के लिए हर वाहन चालक को रिस्क उठानी पड़ रही है। जानकारी अनुसार कल के हादसे में मोटरसाइकिल सवार भी रेलवे फाटक बंद होने से सर्विस रोड पर आकर पुलिए पर चढ़ रहा था।

 


दूसरी और बस संचालक ज्यादा से ज्यादा सवारियां बटोरने के चक्कर में स्पीड से कोई कंप्रोमाइज नहीं कर रहे हैं। कल का हादसा उसी का एक उदाहरण है, 30 की स्पीड वाले खतरनाक पुलिया पर लगभग 80 की स्पीड से अंधाधुन गाड़ी दौड़ा रहा था। जिसके कारण ही सामने आए मोटरसाइकिल को बचाने के लिए स्पीड कम नहीं कर पाया, और पांचौड़ी थाना क्षेत्र के गांव देऊ निवासी एक ही परिवार के शफी खां उनका पुत्र, पुत्रवधू और साली की मृत्यु हो गई। 



   यहां गौर करने वाली बात यह रही कि करीब 50 किलोमीटर दूर से आई दो सवारी की क्षमता वाली बाइक पर चार सवारियां बैठी? ट्रैफिक नियम अनुसार यह गलत है। बाइक चलाते वक्त हेलमेट पहनना जरूरी है और दो से ज्यादा सांवरिया नहीं हो। वाहन तेज स्पीड से नहीं चलना चाहिए। 



  दूसरी और नियमों का पालन करवाने वाले परिवहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस की अनदेखी से बाइक, बस, कैंपर जीप आदि वाहनों में क्षमता से अधिक सवारियां धड़ल्ले से बैठाई जा रही है। हादसे रोकने के लिए इन पर तुरंत प्रभाव से कार्रवाई होनी चाहिए।

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

अप्रैल 11, 2023

प्रवीण चौहान की कलम से.. सचिन पायलट एक तीर, निशाने कई! पढ़ें पुरा विश्लेषण

प्रवीण चौहान की कलम से.. सचिन पायलट एक तीर, निशाने कई! पढ़ें पुरा विश्लेषण



सचिन पायलट भाजपा के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की जांच को लेकर आज अनशन पर बैठे। हालांकि कांग्रेस ने सचिन पायलट के दावों को खारिज कर दिया है। कांग्रेस के प्रवक्ता का कहना है कि भ्रष्टाचार के सभी आरोपों की जांच की जा रही है जबकि पायलट ने प्रेस कान्फ्रेंस कर कहा था कि गहलोत सरकार बीजेपी पर लगाए गए आरोपों पर जांच नहीं कर रही है।




माना जा रहा है कि सचिन पायलट के इस अनशन के निशाने पर राजस्थान की गहलोत सरकार और भाजपा से ज्यादा वसुंधरा है या दोनों हैं। अगर निशाना सिर्फ वसुंधरा है तो भाजपा में उनका कद घटाने की कवायद है। सूत्र बता रहे हैं कि यह सब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के इशारे पर ही हो रहा है। दूसरी और यह भी सामने आ रहा है कि सचिन पायलट के रास्ते आम आदमी पार्टी राजस्थान में धमाकेदार एंट्री कर सकती है।

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पायलट द्वारा लगाए गए आरोपों पर गहलोत का अगला कदम क्या होगा ये देखने वाली बात होगी। आइये समझते हैं। सचिन पायलट के अनशन के मायने ऐसा माना जा रहा है कि सचिन पायलट का ये अनशन कांग्रेस के लिए फायदेमंद ही साबित होगा। अगर किसी पार्टी का नेता अपनी ही सरकार के खिलाफत करता है और विपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल के कथित घोटालों की जांच होगी। विपक्ष के नेताओं पर जांच बैठती है और उनकी गिरफ्तारियां होती हैं तो इससे कांग्रेस को फायदा मिल सकता है।

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सचिन पायलट के अनशन का एक पहलू और निकलकर सामने आ रहा है कि अगर गहलोत पूर्व सीएम वसुंधरा के खिलाफ कार्रवाई करेंगे तो इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा लेकिन अगर गहलोत ऐसा नहीं करते हैं तो सचिन पायलट को ये कहने का मौका मिलेगा कि गहलोत कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। पायलट को गहलोत के खिलाफ एक हथियार मिल जाएगा कि गहलोत सरकार ने पिछले चुनाव में किए वादों को पूरा नहीं किया है।


सिंधिया की राह पर पायलट ?

इस दौरान कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि क्या सचिन पायलट ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह पर चल रहे हैं। दरअसल ज्योतिरादित्य सिंधिया भी तब की अपनी ही कमलनाथ सरकार के खिलाफ अनशन किया था। नतीजा यह हुआ था कि वह अपने समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए थे कमलनाथ की सरकार चली गई थी। तो क्या अब सचिन पायलट भी कांग्रेस छोड़ने का मूड बना रहे हैं? यह देखने वाली बात होगी।

रविवार, 30 सितंबर 2018

सितंबर 30, 2018

सरकारी अस्पताल को शिफ्ट करना कहीं साजिश तो नहीं थी?

सरकारी अस्पताल को शिफ्ट करना कहीं साजिश तो नहीं थी?


नागौर शहर में एक बार फिर पुराने अस्पताल को फिर से शुरू करवाने की मुहिम शुरू की है जो नागौर वासियों के लिए सही भी है। सभी को एकजुटता से इसमें सहयोग देकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। राजनीतिक फायदे या मात्र छपासिए बनकर अपनी छवि बनाने की कोशिश में लगे नेता इससे जितना दूर रहे तोअच्छा है।


अब बात करते हैं मुद्दे की । आप लोगों ने कभी सुना है कि किसी शहर को एक सुविधा देने के एवज में दूसरी सुविधा छीन ली गई हो? लेकिन नागौर में ऐसा हुआ है। एक सरकार ने नागौर वासियों की सुविधाएं बढ़ाने के लिए वर्ष 2008 में बीकानेर हाईवे पर ट्रॉमा सेंटर खोलने की घोषणा कर जमीन अधिग्रहण की थी। उद्देश्य साफ था कि तत्कालीन  सरकारी  अस्पताल में  पूरी सुविधाएं नहीं मिलती थी। जिसके कारण हाईवे पर हो रहे एक्सीडेंट के कारण मरीजों को जोधपुर रेफर किया जाता था। लेकिन सरकार बदलने के साथ ही नागौर से बदला लेने की कारवाई शुरू हो गई थी!


मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाते हुए ट्रॉमा सेंटर को जेएलएन हॉस्पिटल में बदल दिया गया। सुविधा के नाम पर पुराने अस्पताल वाली ही सुविधाएं दी गई है,जेएलएन आज भी रेफरल अस्पताल ही कहलाता है। नया अस्पताल तो बना दिया लेकिन  इसके लिए किसी प्रकार के मापदंडों को नहीं देखा गया कि नागौर वासी तीन रेलवे फाटकों की कैद में है।


जेएलएन हॉस्पिटल की एवज में नागौर वासियों को अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल की बलि देनी पड़ी लेकिन इससे किसी को क्या फर्क पड़ा। सरकारी अस्पताल भवन भूत बंगला बनकर रह गया है। ट्रामा सेंटर को जेएलएन में बदलने राजनीति नजर आ रही है, कोई भी राजनेता नहीं चाहता कि उसकी उपलब्धियों का श्रेय दूसरे को मिले। इसी साजिश का शिकार हुआ है नागौरवासी!


खुशी की बात है कि नागौर के रहनुमा एक होकर पुराने अस्पताल को वापस शुरू करवाने के लिए प्रयासरत है। एक बार फिर से यही उम्मीद है कि आंदोलन में शामिल लोग राजनीति नहीं करेंगे।

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

सितंबर 27, 2018

कौन बनेगा मारवाड़ का बाजीगर? भाजपा बचा पाएगी अपनी सीटें या कांग्रेस छीनेगी अपना किला !

कौन बनेगा मारवाड़ का बाजीगर? भाजपा बचा पाएगी अपनी सीटें या कांग्रेस छीनेगी अपना किला !




इस बार के विधानसभा चुनाव में मिशन 180 को लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ताल ठोक रखी है। इसी मिशन के तहत मारवाड़ क्षेत्र की 43 सीटों के अंतर्गत आने वाली नागौर जिले की 10 विधानसभा को टटोलने अाज नागौर जिले के दौरे पर आ चुकी है। मुख्यमंत्री राजे की गौरव यात्रा का आगाज मेड़ता सिटी के धार्मिक स्थल मीरा मंदिर से आज हो चुका है। साथ ही डेगाना के पुदलोता गांव, परबतसर एवं कुचामन में आम सभा के साथ अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाकर वोटरों को लुभाने का प्रयास करेंगी।



वर्तमान में नागौर जिले की 10 विधानसभा सीटों में से 9 पर भाजपा का कब्जा है, एक सीट निर्दलीय के खाते में है। वर्षों से कांग्रेस का गढ़ रही नागौर जिले के 10 सीटों पर मोदी लहर के चलते पिछली बार कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई थी ।

राजस्थान के सियासी समर में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह लगातार राजस्थान दौरे कर रहे हैं, नागौर में किसान सम्मेलन आदि के जरिये। वही परबतसर मे काग्रेस ने संकल्प रैली के जरिये ताकत दिखाई है और अब नेता जमीनी हकीकत टटोलते हुए नजर आ रहे हैं।सीटों के लिहाज से राजस्थान के सबसे बडा क्षेत्र मारवाड़ है जो कभी काग्रेस का गढ था। जोधपुर संभाग के 6 जिले-बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, जोधपुर, पाली, सिरोही की कुल 33 सीट और नागौर जिले की 10 सीटों को मिलाकर कुल 43 विधानसभा क्षेत्र हैं. लेकिन कांग्रेस का गढ़ रहे मारवाड़ में पिछले चुनाव में बीजेपी ने 39 सीट जीत कर इस गढ़ को ढहा दिया था। कांग्रेस के खाते में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सीट समेत महज तीन सीट आई ।


नागौर जिले की 10 विधानसभा सीट-नागौर, जायल, मेड़ता, लाडनू और डीडवाना नांवा परबतसर मकराना डेगाना सभी सीट पर बीजेपी का कब्जा है। मात्र खिवसर से एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया।
अब कांग्रेस अपना वजूद वापस पाने के लिए चुनाव आने के साथ ही सक्रिय हो गई है, लेकिन पिछले 4 साल को देखें तो लगता है कि कांग्रेस ने विपक्ष का धर्म सही नहीं निभाया है। सरकार की नाकामियों व गलत नीतियों को समय पर और सही रूप से आम जनता के बीच नहीं रखें। अब भी मुद्दे स्थानीय नहीं रख कर केंद्र स्तरीय मुद्दों को भुनाने मे लगी है। टिकट के दावेदारों की लंबी फेहरिस्त भी जीत में अड़ंगा लगा सकती है। नागौर जिले की बात करें तो फिलहाल आज की स्थिति में कौन सी सीट स्पष्ट रूप से जीत सकते हैं दावे के साथ कोई नहीं कह सकता है।


दूसरी ओर सत्ताधारी भाजपा की बात करें तो नागौर जिले में वर्तमान विधायकों के भरोसे सभी सीटें जीतने में नाकाम रहेगी। सत्ता के मद में आमजन को भूलने के आरोप लगते रहे हैं। इन दो पार्टियों के अलावा अन्य प्रत्याशी वोटरों का संतुलन बनाने का काम करेंगे।

शुक्रवार, 15 जून 2018

जून 15, 2018

हठधर्मिता के चलते सड़ रहा है गंदगी से अटा नागौर शहर !

हठधर्मिता के चलते  सड़ रहा है गंदगी से अटा नागौर शहर !


धार्मिक नगरी, ऐतिहासिक नागिणा नगरी ,औजार नगरी आदि कई अच्छे नामों से मशहूर नागौर शहर आपसी अहम की लड़ाई के कारण उपजी हठधर्मिता से आज सड़ रहा है। कल ईद का त्योहार है मुस्लिम समुदाय के लोगों ने त्योहार को मनाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है, लेकिन शहर की हालत देखकर मन मसोस रहे हैं। ऐसा तो नहीं था नागौर?



गंदगी के कारण बाजार से तो निकलना ही दूभर हो रहा है। हर गली मोहल्ले की नालियां गंदगी से भरी है गंदा पानी बाहर सड़क रुपी खड्डोंं पर बह रहा है। ब्रहमपुरी के बाहर स्टेशन रोड पर तीन दिन से मरा हुआ कुत्ता सङ रहा है।


नागौर की धरती पर बाहर से कोई मेहमान आता है तो इस समय की स्थिति देखकर उसके मन में नागौर के प्रति क्या छवि दिमाग में रहती है, हम सोच सकते हैं। शुक्र है इन दिनों ऑफ सीजन के चलते विदेशी पर्यटक को आवक नहीं हो रही है।


हम सब जानते हैं कि हक मांगना जायज है । अपने हक के लिए ही सफाई कर्मी हड़ताल पर हैं मगर नगर परिषद सहित जिला प्रशासन का दायित्व है कि हड़ताल के दौरान सफाई की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए और कुछ नहीं तो कम से कम त्योहारों के अवसर पर आम नागरिक अपने हक के तौर पर साफ सुथरा सुकून वाला वातावरण चाहता है।

शुक्रवार, 1 जून 2018

जून 01, 2018

देखिए कहां हो रहा है सास बहू में तकरार जिससे शहर का हो रहा है बंटाधार लेकिन जनता में मनोरंजन की बहार..

देखिए कहां हो रहा है सास बहू में तकरार जिससे शहर का हो रहा है बंटाधार लेकिन जनता में मनोरंजन की बहार..






नगर परिषद नागौर में महाभारत पार्ट टू शुरू..

बाहुबलियों की रंजिश में नागौर के विकास की चढ़ रही है बलि?

जी हां नगर परिषद नागौर राजनीतिक अखाड़ा बन चुकी है। शह मात के इस खेल में नागौर शहर के विकास की बलि चढ़ रही है। एक बार फिर सास बीनणी के तकरार जैसा हो रहा है नागौर की जनता का मनोरंजन !
नगर परिषद की  तथाकथित सास चाहती कि बीनणी उसका कहा माने। लेकिन क्या करें पिछले 3 साल से बीनणी काबू में नहीं आ रही है। बीनणी का चेहरा तो बदला है लेकिन चरित्र वैसा ही है। बीनणी पर भूमाफियाओं से सांठगांठ के भी आरोप लगे हैं।
ताजा मामला सफाई कर्मियों की भर्ती का है जिसमें नया मोड़ आया है जो 50 सफाई कर्मियों की भर्ती होनी थी उस पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जो मिल रहा है उसको छोड़ कर 300 कर्मियों की भर्ती की मांग पर मामले को अधरझूल में लटकाया जा रहा है। यह सब स्वयं के वोट बैंक को खुश करने की जुगत मात्र नजर आती है।

इस सब राजनीतिक उठापटक के बीच पिछले 4 दिन से नागौर वासी नारकीय जिंदगी जीने को मजबूर हो रहे हैं। शहर में पड़े कचरे के ढेर हड़ताल खुलने के 2 दिन बाद भी वैसे के वैसे ही पड़े हैं। चारों तरफ शहर की सड़कें खुदी पड़ी है वाहनों की आवाजाही  के साथ धूल के गुब्बारे उड़ रहे हैं। अस्थमा पेशेंट के लिए घर से बाहर निकलना जीवन गवाने जैसा हो रहा है। महाभारत- महाभारत खेल रहे इन राजनेताओं को सिर्फ अपने वोटबैंक की पड़ी है। इसी बीच जिला प्रशासन मूक-दर्शक बन मनोरंजन का भागीदार बना हुआ है।