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रविवार, 30 सितंबर 2018

सरकारी अस्पताल को शिफ्ट करना कहीं साजिश तो नहीं थी?

सरकारी अस्पताल को शिफ्ट करना कहीं साजिश तो नहीं थी?


नागौर शहर में एक बार फिर पुराने अस्पताल को फिर से शुरू करवाने की मुहिम शुरू की है जो नागौर वासियों के लिए सही भी है। सभी को एकजुटता से इसमें सहयोग देकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। राजनीतिक फायदे या मात्र छपासिए बनकर अपनी छवि बनाने की कोशिश में लगे नेता इससे जितना दूर रहे तोअच्छा है।


अब बात करते हैं मुद्दे की । आप लोगों ने कभी सुना है कि किसी शहर को एक सुविधा देने के एवज में दूसरी सुविधा छीन ली गई हो? लेकिन नागौर में ऐसा हुआ है। एक सरकार ने नागौर वासियों की सुविधाएं बढ़ाने के लिए वर्ष 2008 में बीकानेर हाईवे पर ट्रॉमा सेंटर खोलने की घोषणा कर जमीन अधिग्रहण की थी। उद्देश्य साफ था कि तत्कालीन  सरकारी  अस्पताल में  पूरी सुविधाएं नहीं मिलती थी। जिसके कारण हाईवे पर हो रहे एक्सीडेंट के कारण मरीजों को जोधपुर रेफर किया जाता था। लेकिन सरकार बदलने के साथ ही नागौर से बदला लेने की कारवाई शुरू हो गई थी!


मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाते हुए ट्रॉमा सेंटर को जेएलएन हॉस्पिटल में बदल दिया गया। सुविधा के नाम पर पुराने अस्पताल वाली ही सुविधाएं दी गई है,जेएलएन आज भी रेफरल अस्पताल ही कहलाता है। नया अस्पताल तो बना दिया लेकिन  इसके लिए किसी प्रकार के मापदंडों को नहीं देखा गया कि नागौर वासी तीन रेलवे फाटकों की कैद में है।


जेएलएन हॉस्पिटल की एवज में नागौर वासियों को अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल की बलि देनी पड़ी लेकिन इससे किसी को क्या फर्क पड़ा। सरकारी अस्पताल भवन भूत बंगला बनकर रह गया है। ट्रामा सेंटर को जेएलएन में बदलने राजनीति नजर आ रही है, कोई भी राजनेता नहीं चाहता कि उसकी उपलब्धियों का श्रेय दूसरे को मिले। इसी साजिश का शिकार हुआ है नागौरवासी!


खुशी की बात है कि नागौर के रहनुमा एक होकर पुराने अस्पताल को वापस शुरू करवाने के लिए प्रयासरत है। एक बार फिर से यही उम्मीद है कि आंदोलन में शामिल लोग राजनीति नहीं करेंगे।

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