जब विदाई में छलक पड़े जज़्बात: बैंड-बाजे के साथ एसपी को किया विदा
एसपी को विदा करने उमङा जनसमूहनागौर। कभी-कभी किसी अधिकारी की विदाई सिर्फ एक औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि वह एक भावनात्मक पल बन जाती है। नागौर में ऐसा ही दृश्य तब देखने को मिला जब पुलिस अधीक्षक मृदुल कच्छावा का तबादला बीकानेर होने पर एसपी ऑफिस से लेकर उनके सरकारी आवास तक बैंड-बाजे के साथ उन्हें विदाई दी गई।
यह दृश्य सामान्य नहीं था। पुलिस विभाग के अधिकारी, जवान और आमजन साथ थे, बैंड की धुन बज रही थी और माहौल में एक अजीब-सी खामोशी और सम्मान दोनों साथ-साथ महसूस हो रहे थे। कई पुलिसकर्मियों की आंखों में नमी भी दिखाई दी। सात महीने के छोटे से कार्यकाल में ही उन्होंने अपने अधीनस्थों के बीच एक अलग पहचान बना ली थी।
इस विदाई के दौरान नव नियुक्त पुलिस अधीक्षक रोशन मीणा भी मौजूद रहे। लेकिन पूरे समारोह में चर्चा एक ही बात की थी कि आखिर सात महीने में ही ऐसा क्या हुआ कि नागौर को अपना सख्त एसपी विदा करना पड़ा?
सात महीने का कार्यकाल, लेकिन तेज़ पहचान
मृदुल कच्छावा जब नागौर आए तो उनके सामने एक चुनौतीपूर्ण जिला था। बजरी माफिया, खनन गिरोह और नशे का कारोबार लंबे समय से चर्चा में रहे थे। भरतपुर जैसे संवेदनशील इलाके में काम करने का अनुभव लेकर आए कच्छावा ने नागौर में आते ही संकेत दे दिया था कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने अपने नाम के अनुरूप अपराधियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। ऑपरेशन नीलकंठ के तहत जिले में ड्रग माफिया पर बड़ी कार्रवाई की गई। नशे के कारोबार पर लगातार नकेल कसने की कोशिशें हुईं।
माफियाओं पर सख्ती
नागौर में बजरी और अवैध खनन के मामले लंबे समय से पुलिस और प्रशासन के लिए चुनौती बने हुए थे। कच्छावा के कार्यकाल में इन पर भी लगातार कार्रवाई की गई। सिर्फ कार्रवाई ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक संदेश भी दिए गए। हाल ही में एक अपराधी को शर्मिंदा करने के लिए 25 पैसे का इनाम घोषित किया गया था, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पुलिस महकमे तक चर्चा बटोरी। इसके अलावा कई अपराधियों द्वारा अवैध तरीके से बनाई गई संपत्तियों पर भी बुलडोज़र चला। यह संदेश साफ था कि अपराध से अर्जित संपत्ति भी सुरक्षित नहीं है।
10 हजार किलो विस्फोटक की बरामदगी
उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित कार्रवाई हरसौर में 10 हजार किलो विस्फोटक की बरामदगी रही। इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक पकड़े जाने की घटना ने पूरे देश का ध्यान नागौर की ओर खींच लिया था। यह कार्रवाई बताती है कि पुलिस केवल छोटी-मोटी घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि बड़े नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी।
तबादले के पीछे की चर्चाएं
हालांकि प्रशासनिक तबादले सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन नागौर में मृदुल कच्छावा के तबादले को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कहा जा रहा है कि उनकी सख्त कार्यशैली से केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि कुछ राजनीतिक हलकों में भी असहजता थी। जानकारी यह भी सामने आई कि उनके कई फैसलों से विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ विधायक भी नाराज चल रहे थे। इसी बीच उनके तबादले की खबर आई और देखते ही देखते नागौर को नया पुलिस अधीक्षक मिल गया।
जश्न और जज़्बात – दोनों साथ
दिलचस्प बात यह रही कि जहां पुलिस महकमे में कई लोग भावुक होकर उन्हें विदा कर रहे थे, वहीं जिले के कुछ हिस्सों में उनके तबादले पर जश्न मनाए जाने की खबरें भी सामने आईं। यही लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबना भी है कि एक ही फैसले पर अलग-अलग भावनाएं।
सवाल जो रह गया
मृदुल कच्छावा का नागौर में कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उन्होंने अपने काम से यह दिखा दिया कि यदि इच्छाशक्ति हो तो सात महीने भी किसी जिले की पुलिस व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी होते हैं। अब सवाल यह है कि नागौर में शुरू हुई यह सख्ती क्या आगे भी जारी रहेगी या यह सिर्फ सात महीनों की एक छोटी-सी कहानी बनकर रह जाएगी?
क्योंकि कानून का असर तभी होता है, जब उसकी निरंतरता बनी रहे।


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