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मंगलवार, 3 जनवरी 2023

जनवरी 03, 2023

इंस्टाग्राम के लिए रील बनाना पड़ा भारी. ट्रेन से कटकर दो किशोर मरे. एक घायल..

इंस्टाग्राम के लिए रील बनाना पड़ा भारी. ट्रेन से कटकर दो किशोर मरे. एक घायल..



बिहार के खगड़िया में रेलवे पुल पर इंस्टाग्राम के लिए रील बना रहे 2 दोस्त ट्रेन की चपेट में आ गए। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई. तीसरे दोस्त ने रेलवे ब्रिज पर सूखी नदी में कूदकर जान बचाई। लेकिन वह गंभीर रूप से घायल है। जिसका इलाज अस्पताल में चल रहा है।


लापरवाही का हादसा एक जनवरी को हुआ था। तीनों की उम्र 16 से 19 साल के बीच है। हादसे में घायल अमन ने बताया कि मैं, सोनू और नीतीश नववर्ष पर धमारा घाट स्टेशन के पास मां कात्यानी मंदिर जा रहे थे. मुख्य मार्ग पर भीड़ थी। इसलिए हमने शॉर्टकट लिया और रेलवे ब्रिज से मंदिर जाने लगे। इसी बीच सोनू और नीतीश रील बनाने लगे।


इसमें से 3 रील्स इस गाने के साथ इंस्टाग्राम पर अपलोड किए गए। ‘2022 में अवसर दिखाने वालों को 2023 में जीवित रहना चाहिए।’ करीब 15 मिनट बाद वे फिर से रील बनाने लगे। तभी दूसरी तरफ से उसी ट्रैक पर एक ट्रेन आ गई। कोहरे के कारण ट्रेन दिखाई नहीं दे रही थी। ट्रेन सोनू और नीतीश को उड़ाते हुए निकल जाती है। मैं कुछ दूर था। ट्रेन को देखते ही वह पुल से कूद गया।


सोनू अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। बेटे की मौत की खबर सुनकर मां की तबीयत बिगड़ गई है। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जानकी एक्सप्रेस में फंस गए नीतीश और सोनू। नितीश के इंस्टाग्राम पर तीनों की पहले से बनाई गई कई रील हैं। इनमें से अधिकांश रेल रेल की पटरियों या रेलवे पुलों के नीचे बनाई जाती हैं। पोस्टमार्टम के बाद शवों को परिजनों को सौंप दिया गया है।

मंगलवार, 20 सितंबर 2022

सितंबर 20, 2022

टॉयलेट के अंदर खाना बनाकर कबड्डी खिलाड़ियों को परोसा. केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिए जांच के आदेश

टॉयलेट के अंदर खाना बनाकर कबड्डी खिलाड़ियों को परोसा. केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिए जांच के आदेश



सहारनपुर. यूपी के सहारनपुर में कबड्डी प्रतियोगिता में आए खिलाड़ियों को टॉयलेट में खाना परोसा गया. बताया जा रहा है कि खाना भी टॉयलेट के अंदर ही बना था. राज्य स्तर की इस कबड्डी प्रतियोगिता में करीब 200 से अधिक खिलाड़ी आए थे. टॉयलेट के अंदर खाना बांटने का वीडियो वायरल होने के बाद सहारनपुर के क्रीड़ा अधिकारी अनिमेष सक्सेना को सस्पेंड कर दिया गया है. इसके साथ ही जिलाधिकारी ने पूरे मामले की जांच बैठा दी है.

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 इसी बीच केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने मामले को गंभीर मानते हुए जांच के आदेश दिए हैं और कहा है कि कोई भी दोषी बक्सा नहीं जाएगा. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में डॉ. भीमराव स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित कबड्डी प्रतियोगिता के दौरान खिलाड़ियों को टॉयलेट के अंदर बना खाना खाने के लिए मजबूर हुए. इसका वीडियो वायरल होने के बाद सहारनपुर के क्रीड़ा अधिकारी अनिमेष सक्सेना को सस्पेंड कर दिया गया है. इसके साथ ही जिलाधिकारी ने जांच बैठा दी है.

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दरअसल, सहारनपुर के डॉ. भीमराव स्पोर्ट्स स्टेडियम में सब जूनियर (बालिका) कबड्डी प्रतियोगिता का तीन दिवसीय आयोजन किया गया. राज्य स्तर की यह कबड्डी प्रतियोगिता 16 सितम्बर से 18 सितम्बर तक चली, जिसमें 17 टीमों ने हिस्सा लिया. यानी करीब 200 से अधिक लोगों की टीम आई हुई थी. इन लोगों का खाना टॉयलेट में बनवाया गया.

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खिलाड़ियों को टॉयलेट में खाना बनाकर खिलाया गया और कच्चे चावल परोसे गए. इस पर क्रीड़ाधिकारी अनिमेष सक्सेना का कहना था कि जब खाना बनाया गया तो हलवाई के चावल खराब आ गए थे, उस चावल को फिंकवा दिया गया और दोबारा चावल बनवाया गया. हालांकि टॉयलेट में खाना बनवाने पर क्रीड़ाधिकारी ने अपनी अलग दलील दी.


क्रीड़ाधिकारी अनिमेष सक्सेना ने कहा कि बारिश के कारण स्विमिंग पुल के बराबर में चेंजिंग रूम में खाने का सामान रखा गया था, क्योंकि स्टेडियम में चारों तरफ़ निर्माण कार्य चल रहा है, इस वजह से हमने स्विमिंग पुल के चेंजिंग रूम में खाना बनाने का इंतजाम किया था, जबकि वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे खाना टॉयलेट में बन रहा है.


वीडियो वायरल होने के बाद जिलाधिकारी सहारनपुर अखिलेश सिंह ने एडीएम वित्त एवं राजस्व रजनीश कुमार मिश्र को जांच कर रिर्पोट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. इसके साथ ही साथ उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता में भाग लेने वाले खिलाड़ियों के मोबाईल नम्बर पर इस मामले में बात की जाए और सबूत लेकर रिपोर्ट पेश की जाए.


इस बीच सहारनपुर के क्रीड़ा अधिकारी अनिमेष सक्सेना को सहारनपुर में आयोजित बालिका कबड्डी प्रतियोगिता में खिलाडियों को खराब भोजन परोसने एवं टॉयलेट का उपयोग किचन के रूप में करने के मामले में खेल निदेशालय द्वारा सस्पेंड कर दिया गया है.

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

सितंबर 06, 2022

'चमड़ी जाए मगर दमड़ी ना जाए' इसी सिद्धांत पर चलकर करोड़पति स्वीपर ने बैंक में रखें 70 लाख रुपए का नहीं किया उपयोग, बीमारी से मौत

'चमड़ी जाए मगर दमड़ी ना जाए' इसी सिद्धांत पर चलकर करोड़पति स्वीपर ने बैंक में रखें 70 लाख रुपए का नहीं किया उपयोग, बीमारी से मौत.



प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के करोड़पति स्वीपर धीरज का निधन हो गया है। स्पीपर घीरज ट्यूबर क्लोसिस (टीबी) से पीड़ित था और इसी बीमारी की वजह से उसकी 4 सितंबर की देर रात निधन हो गया। स्पीपर घीरज के बैंक अकाउंट में 70 लाख रुपये जमा थे। इस खाते से धीरज ने कभी पैसे ही नहीं निकाले, वह प्रयागराज का करोड़पति स्वीपर था। उसने शादी नहीं की थी, धीरज अपनी मां के साथ रहता था। धीरज की मौत के बाद उसकी 80 साल की मां अकेले रह गई हैं, जिनका रो-रोकर बुरा हाल है। प्रयागराज के जिला कुष्ठ रोग विभाग में धीरज स्वीपर कम चौकीदार के पद पर कार्यरत था।

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करोड़पति स्वीपर धीरज उस वक्त चर्चाओं में आया, जब इस साल मई में बैंक के अधिकारी उसके खोजते हुए उसके दफ्तर आए। बैंक अधिकारियों ने खुलासा किया कि उसके बैंक अकाउंट में 70 लाख रुपये हैं। धीरज ने 10 सालों से अपने बैंक से अपनी सैलरी नहीं निकाली थी, इसलिए बैंक वाले उसके बारे में पूछताछ करने ऑफिस पहुंचे थे। इसके बाद अस्पताल और विभागीय के लोग धीरज को ''करोड़पति स्वीपर'' कहकर बुलाने लगे थे। धीरज के बैंक खाते में लाखों रुपये थे, लेकिन फिर भी उसने अपनी टीबी जैसी गंभीर बीमारी का इलाज नहीं करवाया था।


इसके पिता ने भी यही किया था..

धीरज को पिता की मौत के बाद मृतक आश्रित के तौर पर ये नौकरी मिली थी। असल में धीरज के पिता सुरेश चंद्र भी इसी जिला कुष्ठ रोग विभाग में स्वीपर के पद पर कार्यरत थे। नौकरी में रहते ही उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद मृतक आश्रित के तौर पर धीरज को अपने पिता की नौकरी मिल गई। दिसंबर, 2012 से धीरज इस पद पर तैनात था। धीरज ने यह संपत्ति अपने पिता और खुद की मेहनत से कमाई थी। असल में धीरज के पिता ने भी कभी सैलरी नहीं निकाली थी। उसी तरह धीरज का भी हाल था। इसलिए ये पैसे साल-दर-साल बढ़ते चले गए।

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सैलरी नहीं निकाली, मांग कर चलाया घर..

धीरज के पिता भी अपनी नौकरी में कभी भी सैलरी नहीं निकाली, वह घर चलाने के लिए लोगों से पैसे मांगते थे। ठीक उनकी ही तरह धीरज ने भी नौकरी ज्वाइन करने के बाद एक बार भी सैलरी नहीं निकाली और सड़क पर चलते लोगों, विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों से पैसे मांगकर घर चलाया था। लोग उसे गरीब समझकर पैसे दे भी देते थे।


सबसे हैरानी की बात ये है कि धीरज ने अपने इलाज पर पैसे खर्च नहीं किए लेकिन वह ईमानदारी से सरकार को इनकम टैक्स देता था। धीरज के साथ काम करने वाले लोग और दफ्तर के अधिकारियों का कहना है कि वह अपना काम बहुत ईमानदारी से करता था। किसी भी दिन वो दफ्तर लेट नहीं आता था, टाइम से ड्यूटी पर आता और जाता था।


धीरज के साथ काम करने वाले रोशन सरोज ने एक अखबार से बात करते हुए कहा, ''धीरज ईमानदार था। ऑफिस आते वक्त या जाते वक्त जब वह रास्ते में लोगों से मिलता था, तो उनसे पैसे मांगता था, बोलता था भाई पैसे दे दो...नहीं है। वह पता नहीं क्यों बैंक से पैसे नहीं निकालत था। जब बैंक अधिकारी आए थे तो हमने उन्हें बताया था कि वह लोगों से पैसे मांग कर गुजारा करता है।''


धीरज के साथ काम करने वाली शशि कला ने कहा, ''धीरज का व्यवहार बहुत ही अच्छा था। हमें कुछ दिनों पहले ही पता चला था कि वह 70 लाख रुपये का मालिक है। लेकिन वो अपने खाते से पैसे नहीं निकलता है।''बैंक के अधिकारियों ने कई बार धीरज से गुजारिश की कि वह बैंक खाते से पैसे निकाले और लेन-देन करे। पैसे क्यों नहीं निकालता था, इस सवाल के जवाब में धीरज ने बैंक अधिकारियों को कहा था, ''मुझे पैसों की कोई जरूरत ही नहीं है। जब जरूरत नहीं है तो मैं क्यों बैंक से पैसे निकालूं।'' 


धीरज ने शादी नहीं की थी और नाही उसका कोई खास शौक था। धीरज अपनी मां के साथ टीबी सप्रू अस्पताल कैंपस में रहता था। शादी की जैसे ही कोई उससे बात करता था, तो वह गुस्सा होकर भाग जाता था, उसे डर था कि कोई उसके पैसे ना निकाल ले। कुष्ठ रोग विभाग के स्टाफ निखिल खत्री ने एक अखबार को बताया, ''धीरज दिमाग से थोड़ा कमजोर था। लेकिन काम में कोई कमी नहीं थी। वह कभी भी दफ्तर से छुट्टी भी नहीं लेता था।'' वहीं एक अन्य कर्मचारी राजमणि यादव ने कहा, धीरज ने शादी नहीं की थी। उसके कोई शौक भी नहीं थे।


धीरज को एक बार बैंक अधिकारियों ने भिखारी समझ लिया था। कर्मचारी राजमणि यादव ने कहा, ''धीरज कुछ साल पहले बैंक गया था। बैंक अधिकारी को जब उसने अपना अकाउंट नंबर बताया, तो उसको देखकर लगा कि कोई भिखारी कहीं से आ गया है लेकिन जब उसने बैंक खाता चेक किया तो उसके होश उड़ गए। धीरज के बैंक में 70 लाख से अधिक रुपये थे।''


अब धीरज की मौत के बाद सबके दिमाग में एक ही सवाल है कि आखिर इतनी मोटी रकम का अब क्या होगा। धीरज के सहकर्मी कह रहे हैं इतने रुपये होने से धीरज की मां और बहन को भी खतरा है। ऐसे कानून रूप से धीरज का सारा पैसा उसकी मां का होता है। हालांकि धीरज के सहकर्मी अब उसकी और बहन को लेकर चिंतित हैं।

सोमवार, 10 जनवरी 2022

जनवरी 10, 2022

कोविड-19 की नई गाइडलाइंस की कंट्रोवर्सी! वाह क्या तोड़ निकाला है? शहरी बच्चे ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने जाएंगे तो नहीं होगा कोरोना! शहरी और ग्रामीण इलाके की स्कूल के फेर में फंसे अभिभावक। जानिए क्या है पूरा मामला?

कोविड-19 की नई गाइडलाइंस की कंट्रोवर्सी! वाह क्या तोड़ निकाला है? शहरी बच्चे ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने जाएंगे तो नहीं होगा कोरोना! शहरी और ग्रामीण इलाके की स्कूल के फेर में फंसे अभिभावक। जानिए क्या है पूरा मामला?

प्रतीकात्मक फोटो..



नागौर। "सरकार की नई गाइडलाइन हम पर लागू नहीं होती" जी हां यह वाक्य उन प्राइवेट स्कूल संचालकों के हैं जो अपना स्कूल शहर के लगते ग्रामीण इलाकों में खोलकर बैठे हैं। जिनमें 99 प्रतिशत शहरी क्षेत्र के ही बच्चे पढ़ने जाते हैं। कल सरकार की ओर से जारी हुई गाइडलाइन को धता बताते हुए मानने से इंकार कर दिया कि उनके स्कूल ग्रामीण क्षेत्र में है उन पर सरकार की नई गाइडलाइन का आदेश लागू नहीं होता है। 

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शहरी क्षेत्र के बच्चों को ग्रामीण क्षेत्र में स्थित अपने स्कूल जाने और नहीं जाने को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। आज सवेरे अभिभावक सरकार की गाइडलाइन मानकर अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार नहीं किया था परंतु स्कूल वाहन घर पर पहुंचने पर पता चला कि स्कूल संचालित होगी।



अभिभावकों ने स्कूल में फोन लगाया तो जवाब मिला कि उनपर नई गाइडलाइन का नियम लागू नहीं होता है, वह तो ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ाते हैं।

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स्कूल संचालन को लेकर अभिभावक पशोपेश में है कि क्या करें? बड़ा सवाल यह है कि सभी बड़ी निजी स्कूल शहर से लगते ग्रामीण इलाकों में स्थित है, जहां 99% बच्चे शहरी इलाकों के ही पढ़ते हैं। 

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स्कूल भेजने के प्रति अभिभावक इसलिए चिंतित हैं कि कोरोना का नया वेरिएंट तेजी से पैर पसार रहा है. बच्चों को कब तक वैक्सीन नहीं लग पाई है. ऐसे में बच्चों को कोरोना हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा.

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निजी स्कूल ग्रामीण इलाकों में होने का हवाला देकर बच्चों को बुलाते रहे तो क्या कोरोना नहीं फैलेगा? सरकार ने कई बार गाइडलाइन ऐसे जारी की है कि लोगों में असमंजस की स्थिति पैदा होती है।



नई गाइडलाइन लागू नहीं होने का हवाला देकर कई स्कूल संचालकों ने अभिभावकों को मैसेज किया है कि सरकार की गाइडलाइन उन पर लागू नहीं होती वह ग्रामीण इलाकों में स्कूल संचालित करते हैं।


मंगलवार, 24 अगस्त 2021

अगस्त 24, 2021

एक भाई को अपनी बहनों से सांपों को राखी बंधवाना पड़ा भारी, जिस सांप को राखी बंधवा रहा था उसी सांप ने डस लिया, रक्षाबंधन पर बहनों ने खोया अपना भाई..

एक भाई को अपनी बहनों से सांपों को राखी बंधवाना पड़ा भारी, जिस सांप को राखी बंधवा रहा था उसी सांप ने डस लिया, रक्षाबंधन पर बहनों ने खोया अपना भाई..

सांप के काटने पर पैर क देखता युवक

बहनों केेे साथ राखी बांधते हुए युवक



पटना। एक तरफ जहां पूरा देश रक्षाबंधन का त्योहार मना रहा था, वहीं दूसरी तरफ बिहार के सारण जिले में एक भाई को अपनी बहनों से सांपों को राखी बंधवाना भारी पड़ गया। मनमोहन नाम का युवक जिस सांप को राखी बंधवा रहा था उसी के द्वारा डसे जाने से उसकी मौत हो गई. इस हैरान कर देने वाली घटना का एक वीडियो भी सामने आया है जो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है.

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बताया जा रहा है कि सारण जिले के मांझी थाना क्षेत्र के रहने वाले मनमोहन और सांपो की यारी 10 साल पुरानी है, वह अपने गांव में सांपों को रेस्क्यू करने और उसका शिकार हुए लोगों का इलाज करने के लिए मशहूर था। बीते एक दशक में मनमोहन उर्फ भूअर कई जहरीले सांपों को पकड़कर उन्हें लोगों से दूर छोड़ा. रक्षाबंधन के मौके पर उसे अपनी बहन से सांपों को राखी बंधवाने की सूझी. मनमोहन की ये हरकत उसी को भारी पड़ गई और आखिरकार रक्षाबंधन वाले दिन ही उसे अपनी जान से हाथ गंवाना पड़ा. 

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मनमोहन दो जहरीले सांपों को पूछ की तरफ से पकड़ कर उन्हें राखी बंधवा रहा है. हालांकि उसकी बहन ने सांपों से दूरी बनाने में ही भलाई समझी और मनमोहन ने ही सांपों को टीका किया उनकी आरती उतारी। इस बीच मनमोहन का ध्यान भटकने पर एक सांप उसके पैर के करीब आ गया. सांप मनमोहन की उंगलियों के बीच काट लेता है। सांप के काटे जाने के बाद भी मनमोहन को अपनी जान का जरा भी डर नहीं लगा और वह कार्यक्रम जारी रखता है। 

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मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार तबीयत बिगड़ने के बाद मनमोहन को अस्पताल ले जाने की बजाए उसके घर वाले झाड़-फूंक से उसका इलाज करने लगे। इस दौरान उसकी हालत और भी बिगड़ गई। हालत में सुधार ना होता देख उसके परिजन आनन-फानन में मनमोहन को एकमा स्वास्थ्य केंद्र ले जाते हैं लेकिन वहां एंटी-वेनम इंजेक्शन ना होने की वजह से उसे छपरा सदर अस्पताल ले जाया गया. 

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समय पर इलाज ना मिलने की वजह से डॉक्टर मनमोहन को मृत घोषित कर देते हैं. बताया जा रहा है कि आस-पास के इलाके में मनमोहन को सांपों का सच्चा दोस्त कहा जाता था. किसी के घर सांप निकलने पर लोग सबसे पहले उसे ही बुलाने के लिए दौड़ते थे. इतना ही नहीं गांव में किसी को सांप काटता था तो भी उसके इलाज के लिए मनमोहन को ही बुलाया जाता था.


 ग्रामीणों का दावा है कि उसके द्वारा बोले गए मंत्रों से सांप का जहर बेअसर हो जाता था. इस बीच सांप के काटे जाने से ही मनमोहन की मौत की खबर ने सभी को हैरत में डाल दिया है. मनमोहन सांप पकड़ने के बाद उसे जंगल में छोड़ देता था लेकिन रक्षाबंधन वाले दिन उसने दो जहरीले सांपों को राखी बांधने के लिए पकड़ा था.

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

अप्रैल 05, 2019

भारत में ₹100 देकर उम्मीद कर रहे हैं कि खिलाड़ी गोल्ड मेडल जीते! उचित प्रोत्साहन राशि के अभाव में राजस्थान की खेल प्रतिभाएं तोड़ रही है दम?

भारत में ₹100 देकर उम्मीद कर रहे हैं कि खिलाड़ी गोल्ड मेडल जीते! उचित प्रोत्साहन राशि के अभाव में राजस्थान की खेल प्रतिभाएं तोड़ रही है दम?



सरकार की बदइंतजामी और ऊंट के मुंह में जीरे समान प्रोत्साहन राशि से खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही है। खेलों पर गौर करते नहीं और उम्मीद करते है प्रतिभाएं गोल्ड मेडल लेकर आए? जी हां यह सब बातें राज्य सरकार द्वारा खेला के प्रति बढ़ती जा रही उदासीनता के लिए बताई जा रही है। आज के जमाने में ₹100 में एक वक्त का भोजन जुटाना नामुमकिन है वहीं सरकारे उम्मीद कर रही है कि ₹100 प्रतिदिन मानदेय लेकर खिलाड़ी अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन से मेडल जीतकर नाम रोशन करें।



खिलाड़ियों के प्रति बरती जा रही उदासीनता का नमूना शुक्रवार दोपहर में रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला। जिले के हॉकी खिलाड़ी नेशनल लेवल का गेम खेलने नागौर से लुधियाना के लिए रवाना हो रहे थे। यह वह खिलाड़ी है जिनको हॉकी खेल की ट्रेनिंग के लिए राज्य सरकार ₹100 प्रतिदिन दिया है। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लुधियाना जाने पर इन खिलाड़ियों को टीए डीए के पेटे ₹200 प्रतिदिन मिलेंगे। खिलाड़ियों के कोच ने इस राशि को अपर्याप्त बताते हुए सरकार से उचित राशि देने की गुजारिश की है।



जानकारी अनुसार लुधियाना में 7 अप्रैल से 12 अप्रैल तक राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता का आयोजन होगा जिसके लिए नागौर से राजस्थान की टीम रवाना हुई। लड़के और लड़कियों की दो टीमें लुधियाना के लिए गई है। दोनों टीमों में 18 - 18 प्रतिभागी टीम में शामिल है।




बॉयज टीम के कोच हनुमंत सिंह ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा खिलाड़ियों को दी जाने वाली सुविधाएं पर्याप्त नहीं है। ₹200 प्रतिदिन खिलाड़ियों को टीए डीए के नाम देकर मजाक किया जा रहा है। ट्रेनिंग कैंप के लिए मात्र ₹100 प्रतिदिन देकर खिलाड़ियों से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर मेडल जीते।
सुनिए कोच हनुवंत सिंह की जुबानी---

--- प्रवीण चौहान---

बुधवार, 26 सितंबर 2018

सितंबर 26, 2018

प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज के लिए जा रहे हो तो सावधान! बिना डिप्लोमाधारी नर्सिंग स्टाफ ले सकता है आपकी जान!

प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज के लिए जा रहे हो तो सावधान! बिना डिप्लोमाधारी नर्सिंग स्टाफ ले सकता है आपकी जान!



नागौर 26 सितंबर । बिना डिग्री के नर्सिंग स्टाफ से चल रहे हैं जिले के अनेक निजी चिकित्सालय। ऐसे अनट्रेंड स्टाफ के द्वारा मरीजों के स्वास्थ्य विज्ञान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसी के चलते डिप्लोमा धारी नर्सिंग कर्मियों में बेरोजगारी बढ़ रही है। जी हां यह बिल्कुल सही है इसी की शिकायत लेकर आज नर्सिंग छात्र संगठन भारत ने प्रदेश अध्यक्ष सागर जोशी के नेतृत्व में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सुकुमार कश्यप से शिकायत की है। अगर यह सही है तो सावधान हो जाइए निजी चिकित्सालय आपके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
नर्सिंग छात्र संगठन के जिला अध्यक्ष प्रतीक पारीक ने बताया कि नर्सेज की विभिन्न समस्याओं को लेकर सीएमएचओ को ज्ञापन दिया गया है बिना डिप्लोमा धारी नर्सिंग स्टाफ के कारण बेरोजगार नर्सेज में रोष व्याप्त है। कठोर कानून बनाकर बिना डिग्री डिप्लोमा के स्टाफ वह निजी अस्पतालों के संचालकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। जिला महासचिव मुकेश गांधी ने कहा कि प्राइवेट अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ की सैलरी 3000 से ₹5000 मात्र है जो एक तरह से नर्सिंग कर्मियों का आर्थिक सर्वे का मानसिक शोषण है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार नर्सिंग करने का वेतन कम से कम ₹20000 प्रतिमा होना चाहिए।
नर्सिंग कर्मी की मांग पर सीएमएचओ सुकुमार कश्यप ने जल्द से जल्द समस्याओं का समाधान करने का भरोसा दिलाया है।

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

सितंबर 25, 2018

यह नागौर है, यहां इंजीनियर की क्या जरूरत है? हम बेलदारी ही काफी है!

यह नागौर है, यहां इंजीनियर की क्या जरूरत है? हम बेलदारी ही काफी है!


नागौर 25 सितंबर । पिछले 4 दिन से शहर के वार्ड नंबर 23 में सीवरेज लाइन डालने का काम चल रहा है जो मात्र बेलदारों के भरोसे ही चल रहा है। बिना नाप चौप के खड्डा खोदकर पाइप लाइन पसार दी है। चेंबर बनाने के लिए भी घटिया सामग्री का उपयोग हो रहा है। किसी भी सरकारी नुमाइंदे और इंजीनियर ने आकर भी नहीं झांका है। मजदूरों का कथन हम ही इंजीनियर हैं।
जानकारी अनुसार सीवरेज लाइन डालने से पुर्व निर्धारित इन नाप के अनुसार खड्डा होना जरूरी है। पाइप अंदर बिछाने से पूर्व कंक्रीट को बिछाकर जगह लेवल में होना जरूरी है लेकिन इन सब को नजरअंदाज कर रात के अंधेरे में पाइप लाइन डालकर गड्ढों को भरा जा रहा है। चेंबर के लिए सीमेंट मिश्रण मैं सीमेंट दस्तूर के तौर पर डाल रहे हैं। कल शाम को बनाए गए चेंबर मे लगा सीमेंट मिश्रण हाथ लगाने से ही भरभरा कर टूट रहा है जबकि सीमेंट 8 घंटे में पत्थर के माफिक कड़क हो जाती है।
जानकार मानते हैं कि घटिया सीमेंट मिश्रण के कारण जो चेंबर बनता है उसके बार बार टूटने का कारण है क्योंकि वाहनों के आवागमन से वजन सहन नहीं कर पाते हैं और वह  धंस जाते हैं। बड़ा सवाल यही है कि शहर में चल रहे इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए सरकारी नुमाइंदों की मॉनिटरिंग क्यों नहीं है। मनमाने तरीके से काम करने वाले ठेकेदारों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं होती है। आम जन की यही मानता है कि कमीशन खोरी के चलते कोई भी नहीं बोल रहा है।https://youtu.be/yxEsFl88JTI

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

फ़रवरी 05, 2018

जानिए - नागौर की किस ऐतिहासिक इमारत की तुलना चीन की दीवार से होती थी...

खंडहर हो गया है शहर का मजबूत परकोटा...

जयपुर, जोधपुर, दिल्ली की तरह यहां के शासक नागोंर को दुश्मनों एवं प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए कराया था परकोटे का निर्माण ,,
मजबूत परकोटे की तुलना कभी चीन की दीवार से की थी ,,

 राजशाही शासन समाप्त होते ही रास्ते का अड़ंगा समझकर गिराने का काम शुरू ..





नागौर - प्राचीन काल में राजशाही शासक अपने राजाप्रासादों एवं रिहाइशी इलाकों को सामरिक दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए चारों तरफ अभेद किलेबंदी  किया करते थे। जयपुर ,जोधपुर, बीकानेर व दिल्ली आदि की तरह यहां के शासक भी नागौर को दुश्मनों एवं प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए शहर के चारों तरफ अभेध परकोटे का निर्माण कराया था । इस मजबूत और10 फीट चौड़ी परकोटे की तुलना कभी चीन की दीवार से की थी।  विश्व की सबसे मजबूत दीवार के रूप में प्रसिद्ध रही चीन की दीवार कमोबेश नागौर शहर के परकोटे के दीवार के माफिक की मोटी परत (औसर) जैसी ही करीब पांच किमी परिधि में बने परकोटे को राजशाही शासन समाप्त होते ही रास्ते का अड़ंगा समझकर गिराने का काम शुरू कर दिया। इस परकोटे के साथ शहर के सभी 6 दरवाजों को भी गिराने की कारवाई की जाने लगी थी , लेकिन जागरुक लोगों की मांग पर राष्ट्रपति ने प्राचीन धरोहर को तोड़ने से रोक दिया। ऐतिहासिक नगर नागौर (अहिछत्रपुर) ने इतिहास में हर छह माह में युद्ध का मंजर होने का उल्लेख आता है। बार-बार के आक्रमणों से बचाने के लिए दुर्ग के चारों ओर मजबूत परकोटा बनाया गया। इस परकोटे का निर्माण सर्वप्रथम किस शासक ने करवाया यह उल्लेख कहीं नहीं है । आपितु यह है कि हर शासक ने परकोटे को मजबूत रखने के प्रयास अपने स्तर पर करवाए थे। जिस परकोटा इस प्रकार बना हुआ है कि घुङसवार आसानी से चारों ओर पहरा दे सके । परकोटे के बीच बीच में हर मोड़ पर बने बुर्ज थे जिन पर सुरक्षा के लिए तोपों से लैस सैनिक रहते थे । समस तालाब के पूर्वे बुर्ज में दो भीमकाय तोप थी। उनकी  मारक क्षमता करीब 21 किमी तक थी। परकोटा शहर को प्राकृतिक विपदा बाढ़ से बचाने का काम भी करता था। क्योंकि परकोटे के नीचे बड़ी-बड़ी खाईयां थी। परकोटे को कई स्थानों पर गिराने के बाद में यहां 1975 में भयंकर बाढ़ आई थी। अगर परकोटा सुरक्षित होता तो शहर के शिवबाड़ी ,ब्रहमपुरी, भार्गव मौह्ल्ला बाडीकुआ आदि क्षेत्रों में बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता । देश के प्रमुख शहरों में परकोटे अभी भी सुरक्षित रखे हुए हैं। 


बताया जाता की आजादी के बाद साठ के दशक में तत्कालिक पालिका अध्यक्ष ने सड़कों के निर्माण के लिए परकोटे को तुड़वाकर उसके पत्थरों को सड़कों में लगवा दिए थे। जो कुछ बचा था उसको तोड़कर ले जाने में नागरिक भी पीछे नहीं रहे।  आज कुछ स्थानों पर नाम मात्र का परकोटा शेष बचा है, जो दिल्ली दरवाजा के बाहर पुराना बस स्टैंड, कुछ हिस्सा गिनाणी तालाब, बख्त सागर स्कूल की तरफ है। पुराना बस स्टैंड के परकोटे को लोगों ने अपने घर का हिस्सा बना लिया है ।  अब इन परकोटों के अवशेष भी नजर आते हैं । शहर की इस प्राचीन धरोहर को सुरक्षित नहीं रखा जा रहा है .. पूर्व तत्कालिक कलेक्टर समित शर्मा ने गिनाणी तालाब के आसपास के परकोटे का जीर्णोद्वार करवाया था। करीब 200 मीटर तक परकोटे का जीर्णोद्धार करवाया था। उनके स्थानानतरण के बाद वो काम भी बीच में ही अधुरा छोड़ दिया है।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

फ़रवरी 02, 2018

नागौर कलेक्ट्रेट में छलकता है जाम!

नागौर कलेक्ट्रेट में छलकता है जाम!
नागौर कलेक्ट्रेट परिसर में इन दिनों शराब की खाली  बोतलो का नजारा दिख रहा है। परिसर के अंदर डस्टबिन, पौधों की क्यारियां या फिर परिसर के अंदर ही बना गांधी पार्क हो बोतलें नजर आ ही जाती है। कई बार देखा गया है कि अहिंसा के पुजारी तीन मूर्ति के नीचे खाली बोतल पड़ी मिलती है। यह शराब का नशा ही है जो ऐसे निषेध क्षेत्रों में भी पीने को मजबूर कर देता है। नजरिए से देखें तो इसमें जिला प्रशासन की कमी नजर आती है। रात्रि के समय कलेक्ट्रेट परिसर के नए दरवाजे भी शराबियों को अंदर आने से नहीं रोक पा रहे हैं ? परिसर के गेट और दरवाजे हाल ही के दिनों में लाखों रुपए खर्च करके बनाए गए थे। जिला प्रशासन को यह भी पता करना चाहिए कि शराब पीने के शौकीन कहीं उनके स्टाफ तो नहीं है जो ऑफिस टाइम के बाद पार्टी करने का मजा लेते हैं।