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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

जानिए - नागौर की किस ऐतिहासिक इमारत की तुलना चीन की दीवार से होती थी...

खंडहर हो गया है शहर का मजबूत परकोटा...

जयपुर, जोधपुर, दिल्ली की तरह यहां के शासक नागोंर को दुश्मनों एवं प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए कराया था परकोटे का निर्माण ,,
मजबूत परकोटे की तुलना कभी चीन की दीवार से की थी ,,

 राजशाही शासन समाप्त होते ही रास्ते का अड़ंगा समझकर गिराने का काम शुरू ..





नागौर - प्राचीन काल में राजशाही शासक अपने राजाप्रासादों एवं रिहाइशी इलाकों को सामरिक दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए चारों तरफ अभेद किलेबंदी  किया करते थे। जयपुर ,जोधपुर, बीकानेर व दिल्ली आदि की तरह यहां के शासक भी नागौर को दुश्मनों एवं प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए शहर के चारों तरफ अभेध परकोटे का निर्माण कराया था । इस मजबूत और10 फीट चौड़ी परकोटे की तुलना कभी चीन की दीवार से की थी।  विश्व की सबसे मजबूत दीवार के रूप में प्रसिद्ध रही चीन की दीवार कमोबेश नागौर शहर के परकोटे के दीवार के माफिक की मोटी परत (औसर) जैसी ही करीब पांच किमी परिधि में बने परकोटे को राजशाही शासन समाप्त होते ही रास्ते का अड़ंगा समझकर गिराने का काम शुरू कर दिया। इस परकोटे के साथ शहर के सभी 6 दरवाजों को भी गिराने की कारवाई की जाने लगी थी , लेकिन जागरुक लोगों की मांग पर राष्ट्रपति ने प्राचीन धरोहर को तोड़ने से रोक दिया। ऐतिहासिक नगर नागौर (अहिछत्रपुर) ने इतिहास में हर छह माह में युद्ध का मंजर होने का उल्लेख आता है। बार-बार के आक्रमणों से बचाने के लिए दुर्ग के चारों ओर मजबूत परकोटा बनाया गया। इस परकोटे का निर्माण सर्वप्रथम किस शासक ने करवाया यह उल्लेख कहीं नहीं है । आपितु यह है कि हर शासक ने परकोटे को मजबूत रखने के प्रयास अपने स्तर पर करवाए थे। जिस परकोटा इस प्रकार बना हुआ है कि घुङसवार आसानी से चारों ओर पहरा दे सके । परकोटे के बीच बीच में हर मोड़ पर बने बुर्ज थे जिन पर सुरक्षा के लिए तोपों से लैस सैनिक रहते थे । समस तालाब के पूर्वे बुर्ज में दो भीमकाय तोप थी। उनकी  मारक क्षमता करीब 21 किमी तक थी। परकोटा शहर को प्राकृतिक विपदा बाढ़ से बचाने का काम भी करता था। क्योंकि परकोटे के नीचे बड़ी-बड़ी खाईयां थी। परकोटे को कई स्थानों पर गिराने के बाद में यहां 1975 में भयंकर बाढ़ आई थी। अगर परकोटा सुरक्षित होता तो शहर के शिवबाड़ी ,ब्रहमपुरी, भार्गव मौह्ल्ला बाडीकुआ आदि क्षेत्रों में बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता । देश के प्रमुख शहरों में परकोटे अभी भी सुरक्षित रखे हुए हैं। 


बताया जाता की आजादी के बाद साठ के दशक में तत्कालिक पालिका अध्यक्ष ने सड़कों के निर्माण के लिए परकोटे को तुड़वाकर उसके पत्थरों को सड़कों में लगवा दिए थे। जो कुछ बचा था उसको तोड़कर ले जाने में नागरिक भी पीछे नहीं रहे।  आज कुछ स्थानों पर नाम मात्र का परकोटा शेष बचा है, जो दिल्ली दरवाजा के बाहर पुराना बस स्टैंड, कुछ हिस्सा गिनाणी तालाब, बख्त सागर स्कूल की तरफ है। पुराना बस स्टैंड के परकोटे को लोगों ने अपने घर का हिस्सा बना लिया है ।  अब इन परकोटों के अवशेष भी नजर आते हैं । शहर की इस प्राचीन धरोहर को सुरक्षित नहीं रखा जा रहा है .. पूर्व तत्कालिक कलेक्टर समित शर्मा ने गिनाणी तालाब के आसपास के परकोटे का जीर्णोद्वार करवाया था। करीब 200 मीटर तक परकोटे का जीर्णोद्धार करवाया था। उनके स्थानानतरण के बाद वो काम भी बीच में ही अधुरा छोड़ दिया है।

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