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बुधवार, 8 अप्रैल 2026

अप्रैल 08, 2026

मंडी में टूट गई किसान की सांसें: गेहूं की कम कीमत सुनते ही हार्ट अटैक

मंडी में टूट गई किसान की सांसें: गेहूं की कम कीमत सुनते ही हार्ट अटैक

कभी-कभी मौत अचानक नहीं आती, वह धीरे-धीरे बनती है—कर्ज की चिंता से, फसल की बर्बादी से, और उस उम्मीद के टूटने से जो किसान हर मौसम में बोता है। कोटा की भामाशाह मंडी में बुधवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक किसान की मौत नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की कहानी थी जो हर सीजन खेतों में शुरू होती है और कई बार मंडी में आकर टूट जाती है।




गांव झाड़आमली निवासी 54 वर्षीय किसान हंसराज वैष्णव सुबह करीब चार बजे पिकअप में गेहूं भरकर घर से निकले थे। उम्मीद थी कि आज मंडी में फसल बिकेगी तो कुछ कर्ज उतरेगा, घर का खर्च चलेगा और शायद थोड़ी राहत भी मिलेगी। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिख रखा था।



सुबह करीब 11 बजे जब वे मंडी यार्ड में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, तभी नीलामी में गेहूं की कीमत उम्मीद से बहुत कम लगी। बताया जा रहा है कि यह सुनते ही हंसराज गहरे तनाव में आ गए। कुछ ही देर बाद वे अचानक अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। आसपास मौजूद लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।



हंसराज वैष्णव की कहानी उन हजारों किसानों जैसी है जो अपनी छोटी जमीन के सहारे खेती नहीं चला पाते और फिर किराए पर जमीन लेकर खेती करते हैं। परिवार के अनुसार हंसराज के पास खुद की करीब चार बीघा जमीन थी, लेकिन उन्होंने इस बार दस बीघा जमीन लीज पर लेकर गेहूं की फसल बोई थी। खेती में उम्मीद बड़ी थी, लेकिन मौसम ने साथ नहीं दिया।



हाल ही में हुई बारिश और ओलावृष्टि ने गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा दिया। जो फसल बची, उसे बेचने के लिए वे मंडी पहुंचे थे। परिवार के भांजे प्रवीण के मुताबिक हंसराज पहले से ही आर्थिक दबाव में थे। पिछले साल सोयाबीन की फसल भी खराब हो गई थी और उनके ऊपर करीब आठ लाख रुपये का कर्ज हो गया था।



बेटे अजय के अनुसार पिता अक्सर कर्ज की चिंता में रहते थे। कई लोगों के उधार और खेती के खर्च ने उन्हें परेशान कर रखा था। मंडी में कम कीमत की खबर शायद उनके लिए आखिरी झटका साबित हुई।



अनंतपुरा थाना के एएसआई धमंडी लाल ने बताया कि किसान मंडी में फसल बेचने आए थे और वहीं अचेत होकर गिर गए। पोस्टमॉर्टम के बाद ही मौत का सही कारण सामने आएगा, लेकिन जो लोग उस वक्त वहां मौजूद थे, वे कहते हैं कि किसान की चिंता उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।



मंडी में ढेरियों के बीच एक किसान की जिंदगी चुपचाप खत्म हो गई। यह घटना सिर्फ कोटा की एक मंडी की नहीं है। यह उस सवाल की भी है जो हर साल फसल कटने के बाद उठता है। क्या किसान के हिस्से में सिर्फ मेहनत, मौसम का डर और बाजार की अनिश्चितता ही बची है? हंसराज वैष्णव सुबह उम्मीद लेकर मंडी पहुंचे थे। दोपहर होते-होते उनकी जिंदगी खत्म हो गई। पीछे रह गया एक परिवार, कर्ज का बोझ और वह सवाल जो हर किसान की आंखों में छुपा रहता है, क्या मेहनत की सही कीमत कभी मिलेगी?

बुधवार, 25 मार्च 2026

मार्च 25, 2026

धुरंधर 2 ने पाकिस्तान में मचा दी हलचल, अब भिखारियों में ढूंढे जा रहे 'भारतीय जासूस'

धुरंधर 2 ने पाकिस्तान में मचा दी हलचल, अब भिखारियों में ढूंढे जा रहे 'भारतीय जासूस'



कभी-कभी एक फिल्म सिर्फ पर्दे पर नहीं चलती, बल्कि सीमा पार तक हलचल मचा देती है। निर्माता-निर्देशक आदित्य धर की नई फिल्म “धुरंधर 2” के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। भारत में यह फिल्म सिनेमाघरों में चल रही है, लेकिन इसकी गूंज पाकिस्तान की गलियों तक सुनाई दे रही है। फिल्म रिलीज़ होते ही सोशल मीडिया पर एक अजीब किस्म की खबरें घूमने लगीं.. पाकिस्तान के कुछ इलाकों में भिखारियों को पकड़कर पूछताछ की जा रही है कि कहीं वे भारतीय जासूस तो नहीं! यह सुनने में भले ही फिल्मी लगे, लेकिन वहां की मीडिया और सोशल मीडिया चर्चाओं में यह बात बार-बार सामने आ रही है। कह सकते हैं कि धुरंधर 2 ने पाकिस्तान में एक नई बहस छेड़ दी है.. कहीं हर परछाईं में भारतीय जासूस तो नहीं छिपा?




आखिर फिल्म में ऐसा क्या है?

आदित्य धर की फिल्मों की पहचान ही यही है कि वे देश की सुरक्षा, खुफिया ऑपरेशन और आतंकवाद जैसे विषयों को सीधे तरीके से पर्दे पर लाते हैं। “धुरंधर 2” भी उसी शैली की फिल्म है। कहानी भारतीय खुफिया एजेंसियों के उन ऑपरेशनों के इर्द-गिर्द घूमती है जो सीमा पार से संचालित आतंकवादी नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश करते हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह आतंकवाद सिर्फ बंदूक से नहीं चलता, बल्कि उसके पीछे एक पूरा सिस्टम होता है। फंडिंग, ट्रेनिंग और राजनीतिक संरक्षण का। यही वह बात है जो फिल्म को सिर्फ एक्शन थ्रिलर नहीं रहने देती, बल्कि एक राजनीतिक बयान में बदल देती है।



पाकिस्तान में बेचैनी क्यों?

फिल्म में दिखाए गए कुछ दृश्य और संवाद पाकिस्तान में चर्चा का कारण बन गए हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि फिल्म ने जिस तरह पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर चोट की है, उसने वहां के कुछ हलकों को असहज कर दिया है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कहीं लोग इसे भारत का “साइकोलॉजिकल वारफेयर” बता रहे हैं, तो कहीं मजाक उड़ाते हुए कहा जा रहा है कि अब हर भिखारी में जासूस नजर आ रहा है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि जब कोई फिल्म किसी देश की संवेदनशील नस पर हाथ रखती है, तो प्रतिक्रिया होना तय है।



भारत में भी कम नहीं है बहस

दिलचस्प यह है कि भारत में भी फिल्म को लेकर राय एक जैसी नहीं है। एक वर्ग इसे साहसिक फिल्म मान रहा है, जो आतंकवाद की जड़ों पर सीधी चोट करती है। उनका कहना है कि अगर आतंकवाद एक वास्तविक समस्या है तो उसे दिखाना भी जरूरी है।दूसरी ओर कुछ लोग इसे प्रोपेगेंडा सिनेमा कह रहे हैं। उनका आरोप है कि फिल्म एक खास राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करती है और एक वर्ग की छवि खराब करती है। लेकिन फिल्म के समर्थकों का जवाब भी उतना ही सीधा है.. अगर कहानी सच के करीब है तो उसे दिखाने में हिचक क्यों?



बॉक्स ऑफिस और दर्शकों की जिज्ञासा

विवादों के बावजूद फिल्म ने दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा दी है। सिनेमाघरों में भीड़ और सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा यह बता रही है कि धुरंधर 2 ने लोगों को आकर्षित जरूर किया है। कई समीक्षकों ने फिल्म के निर्देशन, बैकग्राउंड स्कोर और एक्शन सीक्वेंस की तारीफ की है। वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि फिल्म कई जगह बहुत आक्रामक हो जाती है। लेकिन शायद यही उसकी ताकत भी है.. वह दर्शकों को तटस्थ रहने का मौका नहीं देती।



सिनेमा की ताकत

इतिहास गवाह है कि कई बार फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म देती हैं। धुरंधर भी शायद उसी श्रेणी में आ गई है। एक तरफ भारत में लोग इसे देशभक्ति और साहस की कहानी मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान में यह बेचैनी का कारण बन गई है। और जब किसी फिल्म पर इतनी प्रतिक्रियाएँ आने लगें, तो समझिए कि उसने कहीं न कहीं असर जरूर किया है।



सवाल यह नहीं है कि धुरंधर 2 सही है या गलत। असली सवाल यह है कि उसने जिस मुद्दे को उठाया है, वह कितना वास्तविक है। अगर एक फिल्म के बाद किसी देश में भिखारियों तक में जासूस ढूंढे जाने लगें, तो यह बताने के लिए काफी है कि सिनेमा कभी-कभी बंदूक से भी ज्यादा असरदार साबित हो सकता है। जय हिंद..

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

मार्च 20, 2026

अब गैस बुकिंग में OTP अनिवार्य: बिना वेरिफिकेशन नहीं मिलेगा सिलेंडर

अब गैस बुकिंग में OTP अनिवार्य: बिना वेरिफिकेशन नहीं मिलेगा सिलेंडर


अब गैस सिलेंडर बुक करना इतना आसान नहीं: OTP और DAC से बदलेगा पूरा सिस्टम




अगर आप भी घर बैठे मोबाइल से गैस सिलेंडर बुक करते हैं, तो अब आपको थोड़ा सतर्क रहना पड़ेगा। राजस्थान में गैस बुकिंग का तरीका बदलने जा रहा है। और यह बदलाव सीधे आपकी जेब, सुविधा और सुरक्षा से जुड़ा है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ने तेल-गैस कंपनियों को नया सिस्टम लागू करने के निर्देश दिए हैं। अब सिलेंडर बुकिंग से लेकर डिलीवरी तक हर चरण में ओटीपी और कोड के जरिए वेरिफिकेशन अनिवार्य होगा।

अब हर बुकिंग होगी OTP से वेरिफाई


अब तक कई बार ऐसा होता था कि गैस एजेंसी खुद बुकिंग कर देती थी या किसी और के नाम से सिलेंडर बुक हो जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब अगर आप मोबाइल एप, वेबसाइट या किसी भी डिजिटल माध्यम से गैस बुक करेंगे, तो आपके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर OTP आएगा और उसी OTP से वेरिफिकेशन के बाद ही बुकिंग पूरी मानी जाएगी।


 Paytm, PhonePe या UPI से भी यही नियम

अगर आप सोच रहे हैं कि किसी दूसरे ऐप से बुकिंग कर लेंगे तो काम आसान हो जाएगा तो ऐसा भी नहीं है। अब चाहे आप

PhonePe

Paytm

UPI

या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से बुकिंग करें, हर स्थिति में OTP वेरिफिकेशन जरूरी रहेगा।



 फर्जी बुकिंग पर लगेगा ब्रेक

इस नए सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब कोई भी व्यक्ति या एजेंसी आपकी जानकारी के बिना गैस बुक नहीं कर पाएगी। हर बुकिंग के लिए उपभोक्ता की अनुमति और OTP जरूरी होगा। इससे फर्जी बुकिंग और गड़बड़ी पर लगाम लगेगी। अब सिलेंडर लेते समय भी देना होगा कोड सिर्फ बुकिंग ही नहीं, अब डिलीवरी के समय भी नया नियम लागू होगा। जब आपका सिलेंडर घर पहुंचेगा, तो आपके मोबाइल पर एक Delivery Authentication Code (DAC) आएगा। यह कोड आपको डिलीवरी बॉय को देना होगा। तभी कंपनी के सर्वर पर यह डिलीवरी पूरी मानी जाएगी। पासबुक में भी दर्ज होगा रिकॉर्ड। डिलीवरी के बाद डिलीवरी बॉय आपके गैस पासबुक या डायरी में इस कोड को लिखेगा, ताकि हर डिलीवरी का रिकॉर्ड पारदर्शी रहे।



आखिर क्यों लाया गया यह सिस्टम?

देश में गैस की सप्लाई और किल्लत को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही थीं। कई जगहों पर फर्जी बुकिंग, डुप्लीकेट डिलीवरी और एजेंसियों की मनमानी, जैसी समस्याएं सामने आईं। इन्हीं गड़बड़ियों को रोकने के लिए यह नया सिस्टम लागू किया गया है।

मार्च 20, 2026

“मैं थक गया हूं…” सुसाइड कर चुके एक रीजनल मैनेजर की यह कहानी अंदर तक झकझोर देगी

“मैं थक गया हूं…” सुसाइड कर चुके एक रीजनल मैनेजर की यह कहानी अंदर तक झकझोर देगी

सब कुछ था… फिर भी खत्म कर ली जिंदगी: जयपुर की यह चुप कहानी बहुत कुछ कहती है...




कभी-कभी जिंदगी बाहर से बिल्कुल ठीक दिखती है… अच्छी नौकरी, बड़ा पद, सम्मान, परिवार.. सब कुछ। लेकिन अंदर क्या चल रहा है, यह शायद कोई नहीं देख पाता। जयपुर के चित्रकूट इलाके में सामने आई एक खबर ने फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है। आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी के रीजनल हेड अजय अरोड़ा ने अपने ही घर में फांसी लगाकर जीवन समाप्त कर लिया। कमरे में बेडशीट से बना फंदा… और पास ही एक सुसाइड नोट, जिसमें लिखा था, “मैं प्रोफेशनल लाइफ और फाइनेंशियल कंडीशन से थक गया हूं…”




बाहर से सफल… अंदर से थका हुआ इंसान


45 साल के अजय अरोड़ा, एक बड़ा नाम, एक जिम्मेदार पद, लेकिन शायद अंदर से एक बेहद थका हुआ इंसान। करीब एक साल पहले उनका ट्रांसफर जयपुर हुआ था। वह यहां अकेले रह रहे थे, जबकि उनकी पत्नी और बेटी उदयपुर में थीं। एक तरफ करियर की जिम्मेदारियां, दूसरी तरफ परिवार से दूरी, और ऊपर से फाइनेंशियल दबाव.. यह सब मिलकर शायद एक ऐसा बोझ बन गया, जिसे वह अब उठा नहीं पा रहे थे।



वो सन्नाटा, जो सब कुछ कह गया


शाम करीब 6 बजे, जब पड़ोसी किसी काम से उनके घर पहुंचे, तो दरवाजे के पीछे जो दृश्य था, उसने सब कुछ बदल दिया। पुलिस आई, जांच हुई, लेकिन कमरे का सन्नाटा सब कुछ कह चुका था। कोई शोर नहीं था, कोई संघर्ष नहीं दिखा.. बस एक फैसला, जो चुपचाप लिया गया।



सुसाइड नोट… और एक बड़ा सवाल


अजय अरोड़ा ने अपने सुसाइड नोट में साफ लिखा कि “मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करता हूं” “किसी का कोई कसूर नहीं है” “मैं किसी दबाव में नहीं हूं” यानी बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है। लेकिन असल सवाल यहीं से शुरू होता है.. अगर कोई दबाव नहीं था, तो फिर ऐसा क्या था जिसने एक सफल इंसान को यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? क्या हम “ठीक दिखने” को ही सच मान लेते हैं? आज के दौर में सबसे बड़ा संकट शायद यही है कि हम लोगों को उनके चेहरे से आंकते हैं, उनके हालात से नहीं। जो मुस्कुरा रहा है, वह जरूरी नहीं कि खुश भी हो। जो सफल दिख रहा है, वह जरूरी नहीं कि अंदर से संतुलित भी हो। कॉर्पोरेट दुनिया की चमक के पीछे कई बार थकान, अकेलापन और दबाव का अंधेरा छुपा होता है।



यह सिर्फ एक खबर नहीं, एक संकेत है


अजय अरोड़ा का जाना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, यह हम सबके लिए एक चेतावनी है। क्या हम अपने आसपास के लोगों को सच में समझते हैं? क्या हम उनकी थकान, उनके तनाव को महसूस कर पाते हैं? या सिर्फ उनकी “सक्सेस” देखकर संतुष्ट हो जाते हैं?



अंत में…

जिंदगी में समस्याएं हर किसी के पास होती हैं, लेकिन उनका अंत कभी समाधान नहीं होता। क्योंकि हर कठिन दौर के बाद एक नया रास्ता निकलता है कि जरूरत सिर्फ इतना है कि हम उस वक्त टूटने की बजाय किसी से जुड़ जाएं। कभी-कभी एक बातचीत, एक फोन कॉल, या एक “मैं तुम्हारे साथ हूं” किसी की पूरी जिंदगी बचा सकता है।

बुधवार, 18 मार्च 2026

मार्च 18, 2026

एक चिंगारी… और 8 जिंदगियां खत्म: टाटा पंच की चार्जिंग के दौरान घर में लगी आग ने छोड़े कई सवाल

एक चिंगारी… और सब कुछ खत्म: इंदौर की आग ने हमें क्या सिखाया?

आग के दौरान मकान में उठती आज की लपटे।



कभी-कभी जिंदगी को खत्म होने में वक्त नहीं लगता… बस एक चिंगारी काफी होती है। इंदौर के प्रीति नगर में आज जो हुआ, वह सिर्फ एक हादसा नहीं था, वह एक ऐसा दृश्य था, जिसे सोचकर भी रूह कांप जाती है। ईवी चार्जिंग के दौरान हुए एक शॉर्ट सर्किट ने देखते ही देखते पूरे घर को आग के हवाले कर दिया। कुछ ही मिनटों में लपटें इतनी तेज़ हो गईं कि घर में रखे एलपीजी सिलेंडर भी फटने लगे। एक के बाद एक धमाके… और फिर चीखें। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि अंदर मौजूद लोग बाहर निकल भी नहीं पाए। 8 लोग जिंदा जल गए। 3 लोग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।

आग में जल गए बच्चे का शव पोटली में लपेटकर ले जाते हुए।




आग नहीं, बेबसी ज्यादा जली

पड़ोसी दौड़े… बाल्टियों में पानी लाए… दरवाज़े पर खड़े होकर आवाज़ें लगाईं… लेकिन जब सिलेंडर फटने लगे, तो हर कोई पीछे हट गया। क्योंकि उस वक्त कोई इंसान नहीं, आग और धमाकों का डर हावी था। यह वो पल था, जब इंसानियत मदद करना चाहती थी… लेकिन हालात ने हाथ बांध दिए।



मेहमान बनकर आए… और कभी लौट नहीं पाए

इस हादसे की सबसे दर्दनाक बात यह है कि घर में कुछ लोग मेहमान बनकर आए थे। वे किसी कार्यक्रम में शामिल होने इंदौर पहुंचे थे। किसे पता था कि जिस घर में ठहर रहे हैं, वहीं उनकी जिंदगी की आखिरी रात बन जाएगी। एक मासूम बच्चे का शव इतना जल चुका था कि उसे पोटली में बांधकर बाहर निकालना पड़ा… यह दृश्य सिर्फ एक खबर नहीं, एक ऐसा जख्म है जो लंबे समय तक भर नहीं पाएगा।



सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, लापरवाही का भी है

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक दुर्घटना थी?या इसमें कहीं न कहीं हमारी लापरवाही भी शामिल है? ईवी चार्जिंग जो आज के दौर में आम होती जा रही है, क्या हम उसकी सुरक्षा को उतनी गंभीरता से ले रहे हैं? क्या सही वायरिंग थी? क्या चार्जिंग सिस्टम मानकों के अनुसार था? क्या घर में फायर सेफ्टी का कोई इंतजाम था? शायद इन सवालों के जवाब ही इस हादसे की असली कहानी बताएंगे।



एक सीख, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता

इंदौर की यह आग सिर्फ एक घर को नहीं जलाई, इसने हमारी लापरवाही, हमारी तैयारियों की कमी और हमारी सोच को भी बेनकाब कर दिया है। आज जरूरत है कि हम समझें-

नई तकनीक (जैसे EV) अपनाना गलत नहीं है' लेकिन बिना सुरक्षा के उसे अपनाना खतरनाक जरूर है। घर में एक छोटा-सा शॉर्ट सर्किट, और फिर सिलेंडर… बस इतना ही काफी था सब कुछ खत्म करने के लिए।


अंत में…

कल तक जो घर हंसी से भरा था, आज वहां सन्नाटा है। कल तक जो लोग साथ बैठकर खाना खा रहे थे, आज उनकी पहचान तक मुश्किल हो गई। जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होनी चाहिए कि एक चिंगारी उसे खत्म कर दे।

इंदौर का यह हादसा सिर्फ खबर नहीं है—

यह एक चेतावनी है,

जिसे अगर हमने आज भी नजरअंदाज किया,

तो अगली खबर शायद किसी और शहर से आएगी…

और कहानी फिर वही होगी।

सोमवार, 16 मार्च 2026

मार्च 16, 2026

जब विदाई में छलक पड़े जज़्बात: बैंड-बाजे के साथ एसपी को किया विदा

जब विदाई में छलक पड़े जज़्बात: बैंड-बाजे के साथ एसपी को किया विदा

एसपी को विदा करने उमङा जनसमूह


नागौर। कभी-कभी किसी अधिकारी की विदाई सिर्फ एक औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि वह एक भावनात्मक पल बन जाती है। नागौर में ऐसा ही दृश्य तब देखने को मिला जब पुलिस अधीक्षक मृदुल कच्छावा का तबादला बीकानेर होने पर एसपी ऑफिस से लेकर उनके सरकारी आवास तक बैंड-बाजे के साथ उन्हें विदाई दी गई।



यह दृश्य सामान्य नहीं था। पुलिस विभाग के अधिकारी, जवान और आमजन साथ थे, बैंड की धुन बज रही थी और माहौल में एक अजीब-सी खामोशी और सम्मान दोनों साथ-साथ महसूस हो रहे थे। कई पुलिसकर्मियों की आंखों में नमी भी दिखाई दी। सात महीने के छोटे से कार्यकाल में ही उन्होंने अपने अधीनस्थों के बीच एक अलग पहचान बना ली थी।



इस विदाई के दौरान नव नियुक्त पुलिस अधीक्षक रोशन मीणा भी मौजूद रहे। लेकिन पूरे समारोह में चर्चा एक ही बात की थी कि आखिर सात महीने में ही ऐसा क्या हुआ कि नागौर को अपना सख्त एसपी विदा करना पड़ा?


सात महीने का कार्यकाल, लेकिन तेज़ पहचान


मृदुल कच्छावा जब नागौर आए तो उनके सामने एक चुनौतीपूर्ण जिला था। बजरी माफिया, खनन गिरोह और नशे का कारोबार लंबे समय से चर्चा में रहे थे। भरतपुर जैसे संवेदनशील इलाके में काम करने का अनुभव लेकर आए कच्छावा ने नागौर में आते ही संकेत दे दिया था कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने अपने नाम के अनुरूप अपराधियों के खिलाफ अभियान शुरू किया। ऑपरेशन नीलकंठ के तहत जिले में ड्रग माफिया पर बड़ी कार्रवाई की गई। नशे के कारोबार पर लगातार नकेल कसने की कोशिशें हुईं।



माफियाओं पर सख्ती


नागौर में बजरी और अवैध खनन के मामले लंबे समय से पुलिस और प्रशासन के लिए चुनौती बने हुए थे। कच्छावा के कार्यकाल में इन पर भी लगातार कार्रवाई की गई। सिर्फ कार्रवाई ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक संदेश भी दिए गए। हाल ही में एक अपराधी को शर्मिंदा करने के लिए 25 पैसे का इनाम घोषित किया गया था, जिसने सोशल मीडिया से लेकर पुलिस महकमे तक चर्चा बटोरी। इसके अलावा कई अपराधियों द्वारा अवैध तरीके से बनाई गई संपत्तियों पर भी बुलडोज़र चला। यह संदेश साफ था कि अपराध से अर्जित संपत्ति भी सुरक्षित नहीं है।



10 हजार किलो विस्फोटक की बरामदगी


उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित कार्रवाई हरसौर में 10 हजार किलो विस्फोटक की बरामदगी रही। इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक पकड़े जाने की घटना ने पूरे देश का ध्यान नागौर की ओर खींच लिया था। यह कार्रवाई बताती है कि पुलिस केवल छोटी-मोटी घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि बड़े नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी।



तबादले के पीछे की चर्चाएं


हालांकि प्रशासनिक तबादले सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन नागौर में मृदुल कच्छावा के तबादले को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कहा जा रहा है कि उनकी सख्त कार्यशैली से केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि कुछ राजनीतिक हलकों में भी असहजता थी। जानकारी यह भी सामने आई कि उनके कई फैसलों से विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ विधायक भी नाराज चल रहे थे। इसी बीच उनके तबादले की खबर आई और देखते ही देखते नागौर को नया पुलिस अधीक्षक मिल गया।



जश्न और जज़्बात – दोनों साथ


दिलचस्प बात यह रही कि जहां पुलिस महकमे में कई लोग भावुक होकर उन्हें विदा कर रहे थे, वहीं जिले के कुछ हिस्सों में उनके तबादले पर जश्न मनाए जाने की खबरें भी सामने आईं। यही लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था की विडंबना भी है कि एक ही फैसले पर अलग-अलग भावनाएं।



सवाल जो रह गया


मृदुल कच्छावा का नागौर में कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उन्होंने अपने काम से यह दिखा दिया कि यदि इच्छाशक्ति हो तो सात महीने भी किसी जिले की पुलिस व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी होते हैं। अब सवाल यह है कि नागौर में शुरू हुई यह सख्ती क्या आगे भी जारी रहेगी या यह सिर्फ सात महीनों की एक छोटी-सी कहानी बनकर रह जाएगी?

क्योंकि कानून का असर तभी होता है, जब उसकी निरंतरता बनी रहे।

शनिवार, 14 मार्च 2026

मार्च 14, 2026

किराणा दुकान की आड़ में मौत का व्यापार: जब पूरा परिवार बन गया नशे का सौदागर

नशे का कारोबार: जब पूरा परिवार ही बन गया मौत का सौदागर

कहते हैं कि अपराध कभी अकेला नहीं आता। वह धीरे-धीरे इंसान की सोच, परिवार और आने वाली पीढ़ियों तक को अपने जाल में फंसा लेता है। नागौर जिले के डेह गांव से सामने आई एक घटना इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। यहां एक ऐसा परिवार सामने आया है, जिसने नशे को सिर्फ धंधा नहीं बल्कि जैसे अपनी विरासत बना लिया। घर का मुखिया पहले से ही ड्रग तस्करी के आरोप में जेल में है, लेकिन उससे सबक लेने के बजाय पत्नी और बेटे ने उसी रास्ते को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया।



एएनटीएफ और स्थानीय पुलिस ने जब दबिश दी, तो किराणा दुकान की आड़ में चल रहा यह काला कारोबार सामने आ गया। पुलिस ने मां-बेटे को गिरफ्तार कर उनके पास से 27.37 ग्राम अवैध एमडी और 50 हजार से ज्यादा की ड्रग मनी बरामद की।


किराणा दुकान… या मौत का अड्डा?
गांव में यशोदा की एक छोटी-सी किराणा दुकान थी। बाहर से देखने पर यह एक सामान्य दुकान लगती थी, जहां लोग नमक, तेल या रोजमर्रा का सामान खरीदने आते होंगे। लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा खतरनाक थी।
बताया जा रहा है कि यही दुकान नशे के आदी लोगों के लिए एमडी सप्लाई का केंद्र बन चुकी थी। दुकान केवल एक मुखौटा थी, जिसके पीछे युवाओं की जिंदगी बर्बाद करने वाला कारोबार चल रहा था।



यशोदा का बेटा संजय उर्फ पिंटू इस नेटवर्क को गांवों और ढाणियों तक फैलाने का काम करता था। पिता पहले से जेल में था, लेकिन परिवार ने उस रास्ते को छोड़ने की बजाय उसी पर आगे बढ़ने का फैसला किया।


अपराध की विरासत
इस पूरे मामले की सबसे चिंताजनक बात यह है कि यहां अपराध किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा। पिता संतोषराम पहले से ही तस्करी के मामलों में जेल में है। बेटा संजय ने पिता के जेल जाने के बाद धंधे की कमान संभाल ली।



मां यशोदा भी लालच के चलते इस काले कारोबार में शामिल हो गई।
यानी एक परिवार, जो समाज के लिए उदाहरण बन सकता था, वही नशे के जाल का केंद्र बन गया। एएनटीएफ को मुखबिर से सूचना मिली थी कि डेह गांव में बड़े स्तर पर नशे का कारोबार चल रहा है। पुलिस टीम जब संतोषराम के घर पहुंची तो गेट खुला मिला।
अचानक पुलिस को सामने देखकर मां-बेटे के चेहरे से रंग उड़ गया। तलाशी के दौरान कमरे से एमडी और नकद पैसे बरामद हुए। इसके बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।



असली सवाल: लालच इतना क्यों?
यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि समाज के सामने एक गहरा सवाल भी खड़ा करती है। क्या कुछ पैसों के लालच में इंसान इतना अंधा हो सकता है कि वह दूसरों के बच्चों की जिंदगी बर्बाद करने लगे?
नशा बेचने वाला शायद कुछ समय के लिए पैसे कमा लेता है, लेकिन वह भूल जाता है कि यह पैसा कभी सुख नहीं देता। अक्सर ऐसे रास्ते का अंत जेल, बदनामी और टूटे हुए परिवार के रूप में ही होता है।



समाज के लिए सबक
डेह गांव की यह घटना हमें कई बातें सिखाती है।
पहली बात—अपराध कभी समाधान नहीं होता।
दूसरी बात—नशे का कारोबार सिर्फ कानून का नहीं, समाज का भी दुश्मन है।
और तीसरी बात—जब परिवार गलत रास्ते पर चल पड़े, तो उसका असर पीढ़ियों तक जाता है।



आज जरूरत है कि समाज ऐसे मामलों पर सिर्फ खबर पढ़कर आगे न बढ़ जाए, बल्कि जागरूक बने। यदि कहीं भी नशे का कारोबार दिखाई दे तो उसकी सूचना तुरंत पुलिस को देनी चाहिए। क्योंकि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे समाज को खोखला कर देता है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

मार्च 13, 2026

दिल दहला देने वाली घटना: होमगार्ड और पत्नी ने ट्रेन के आगे लेटकर दी जान...

आखिरी आलिंगन और चलती ट्रेन: झज्जर में दर्दनाक फैसला जिसने कई सवाल छोड़ दिए


झज्जर (हरियाणा)। कभी-कभी जिंदगी की मजबूरियां इंसान को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती हैं, जहां आगे सिर्फ अंधेरा ही दिखाई देता है। हरियाणा के झज्जर जिले में गुरुवार को ऐसी ही एक हृदयविदारक घटना सामने आई, जिसने न सिर्फ एक परिवार बल्कि पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया।


रोहतक-झज्जर-रेवाड़ी रेलवे लाइन पर जिला मुख्यालय में तैनात एक पुलिस अधिकारी के स्टाफ में शामिल होमगार्ड सुनील कुमार ने अपनी पत्नी हिमांशी को गले लगाकर मदार एक्सप्रेस के सामने लेटकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने रिश्तों, बीमारी, तनाव और सामाजिक दबावों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मृतकों की पहचान गांव जौंधी निवासी 28 वर्षीय सुनील कुमार और 24 वर्षीय हिमांशी के रूप में हुई है। घटना की सूचना मिलते ही रेलवे पुलिस चौकी प्रभारी राकेश कुमार एफएसएल टीम के साथ मौके पर पहुंचे और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया शुरू की।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार क्या हुआ
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक दोपहर करीब 1:15 बजे सुनील अपनी पत्नी के साथ जौंधी और गुढ़ा गांव के पास रेलवे फाटक के निकट पहुंचे। उन्होंने बाइक को किनारे खड़ा किया। करीब 2:05 बजे जैसे ही मदार एक्सप्रेस वहां से गुजरी, दोनों एक-दूसरे को गले लगाकर पटरी पर लेट गए।
ट्रेन उन्हें करीब 200 मीटर तक घसीटती हुई आगे निकल गई। बाद में ट्रेन को थोड़ा पीछे करके शवों को बाहर निकाला गया।
अस्पताल जाने का बहाना और फिर…
परिजनों के अनुसार सुनील और हिमांशी घर से यह कहकर निकले थे कि हिमांशी की पेशाब की नलकी बदलवाने अस्पताल जा रहे हैं। लेकिन घटना स्थल से कुछ दूरी पहले ही नलकी निकालकर फेंक दी गई थी। जौंधी गांव से घटना स्थल की दूरी लगभग 10 से 12 किलोमीटर बताई जा रही है।
बीमारी और मानसिक तनाव की चर्चा
बताया जा रहा है कि सुनील और हिमांशी की शादी करीब ढाई साल पहले हुई थी। सात महीने पहले ही उनके घर बेटी का जन्म हुआ था। लेकिन हिमांशी लंबे समय से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रही थी और इसी कारण वह लगातार मानसिक तनाव में रहती थी।
दो दिन पहले उसकी तबीयत अधिक बिगड़ने पर बच्ची को उसकी बुआ के पास भेज दिया गया था।
मायके पक्ष के आरोप
घटना के बाद हिमांशी के मायके पक्ष ने आरोप लगाया है कि उसे पहले से परेशान किया जा रहा था। इस मामले की जानकारी मिलते ही जिला परिषद चेयरमैन कप्तान बिरधाना, भाजपा नेता संत सुरहेती सहित कई स्थानीय लोग अस्पताल पहुंचे।
दोनों शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए सामान्य अस्पताल लाया गया, लेकिन दोनों पक्षों के बयान और बातचीत की प्रक्रिया चलने के कारण देर शाम तक पोस्टमॉर्टम शुरू नहीं हो पाया था।
रेलवे पुलिस चौकी प्रभारी राकेश कुमार के अनुसार मामले की जांच जारी है और दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। आगे की कार्रवाई इन्हीं बयानों के आधार पर की जाएगी।

बुधवार, 11 मार्च 2026

मार्च 11, 2026

भारत की पहली इच्छा मृत्यु.. 13 साल बिस्तर पर पड़े बेटे के लिए अदालत का फैसला: जीने का अधिकार या सम्मानजनक विदाई?

भारत की पहली इच्छा मृत्यु.. 13 साल बिस्तर पर पड़े बेटे के लिए अदालत का फैसला: जीने का अधिकार या सम्मानजनक विदाई?

कभी-कभी अदालतों में आने वाले मामले सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहते, वे इंसानी संवेदनाओं, परिवार की पीड़ा और जीवन-मृत्यु के सबसे कठिन सवालों से टकराते हैं। सुप्रीम कोर्ट में हरीश राणा का मामला भी ऐसा ही था—एक ऐसा मामला जिसमें कानून को तय करना था कि जीवन को हर हाल में बनाए रखना जरूरी है या कभी-कभी प्रकृति को अपना रास्ता चुनने देना ही इंसानियत है।



नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने बुधवार को 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार की उस याचिका पर फैसला सुनाया, जिसमें परिवार ने हरीश के लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने लंबी सुनवाई और मेडिकल विशेषज्ञों की राय के बाद परिवार को यह अनुमति दे दी।



हरीश राणा कभी पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र थे। वर्ष 2013 में एक हादसे में वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। सिर में गंभीर चोट लगी और तब से उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। हादसे के बाद से वह 100 प्रतिशत क्वाड्रीप्लेजिक डिसेबिलिटी के साथ ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में हैं। पिछले तेरह वर्षों से वह बिस्तर पर हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं।



इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जल्दबाजी नहीं की। अदालत ने परिवार से बात की, मेडिकल बोर्ड की राय ली, केंद्र सरकार का पक्ष सुना और कई स्तरों पर विचार करने के बाद जनवरी 2026 में फैसला सुरक्षित रखा था। डॉक्टरों की टीम और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भी अदालत को बताया कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में अब प्रकृति को अपना रास्ता चुनने देना ही उचित होगा।


फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने न केवल कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की बल्कि इस संवेदनशील मामले में काम करने वाली कानूनी टीम की भी सराहना की। अदालत ने एडवोकेट रश्मि नंदकुमार, ध्वनि मेहता और लॉ क्लर्क्स की मेहनत और गहन शोध की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी मदद से इस मामले में संतुलित और न्यायसंगत फैसला संभव हो पाया।



सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एक बार फिर एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया के बीच स्पष्ट अंतर भी समझाया। अदालत ने कहा कि भारत में एक्टिव यूथेनेशिया यानी दवा देकर किसी की मृत्यु करना अवैध है। लेकिन पैसिव यूथेनेशिया—जिसमें जीवन बनाए रखने वाली मशीनें या उपचार हटाए जाते हैं—कुछ परिस्थितियों में अनुमति योग्य हो सकता है। खासकर तब, जब मरीज लंबे समय से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में हो और मेडिकल बोर्ड इसकी पुष्टि करे।



फैसले की शुरुआत करते हुए अदालत ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध कथन “टू बी ऑर नॉट टू बी” का उल्लेख भी किया। इस संदर्भ में अदालत ने कहा कि जीवन और मृत्यु से जुड़ा यह सवाल सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि गहरे मानवीय और नैतिक आयामों से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यह भी माना कि जब कोई मरीज पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाए, तब उसके हित, गरिमा और परिवार की स्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय लेना जरूरी होता है।



सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हरीश राणा के परिवार की भी सराहना की। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक अपने बेटे की देखभाल करना और उसका साथ न छोड़ना परिवार के अटूट प्रेम और समर्पण का उदाहरण है। तेरह वर्षों तक परिवार ने उम्मीद का साथ नहीं छोड़ा, लेकिन जब डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि अब कोई संभावना नहीं बची है, तब उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।



हरीश राणा का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस कठिन सवाल को सामने लाता है, जिससे आधुनिक चिकित्सा और कानून दोनों जूझ रहे हैं—क्या हर हाल में जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखना जरूरी है, या कभी-कभी सम्मानजनक विदाई भी इंसान के अधिकारों में शामिल हो सकती है?

मंगलवार, 10 मार्च 2026

मार्च 10, 2026

शकीला किसकी पत्नी? राजस्थान और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में चल रही अनोखी कानूनी जंग

शकीला किसकी पत्नी? राजस्थान और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में चल रही अनोखी कानूनी जंग

राजस्थान के युवक ने मंदिर में शादी का दावा किया, कश्मीर के युवक ने निकाहनामा पेश किया

जोधपुर। जम्मू-कश्मीर की एक युवती से दो युवकों की प्रेम कहानी अधर में है। राजस्थान और जम्मू कश्मीर के दो युवकों ने युवती से शादी का दावा किया है। एक ने राजस्थान और दूसरे ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में युवती से शादी का दावा करते हुए याचिकाएं दायर की हैं। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग की शकीला अख्तर की कुछ समय से राजस्थान पुलिस तलाश कर रही है।

यह है जितेंद्र सिंह और शकील अख्तर की AI जेनरेटेड इमेज जिसमें दावा किया जा रहा है कि इन्होंने मंदिर में शादी की



डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) जिले के बरड़वा थाना क्षेत्र के सुदरासन गांव के रहने वाले जितेंद्र सिंह ने राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की है। जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि उन्होंने शकीला से 16 फरवरी 2025 को पंजाब के फिरोजपुर में शादी की थी। उन्होंने याचिका में शादी से जुड़े दस्तावेज पेश किए।उन्होंने शकीला को सौंपने की मांग की है।




जितेंद्र सिंह की याचिका पर आज (मंगलवार) राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर में सुनवाई प्रस्तावित है। यह मामला जस्टिस फरजंद अली की कोर्ट में लिस्ट है। इसके लिए डीडवाना के बरड़वा थाने के एसएचओ महेंद्रसिंह भी अभी तक कि जांच के डॉक्यूमेंट्स के साथ कोर्ट में मौजूद रहेंगे। उधर, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में शकीला और शब्बीर अहमद खान से जुड़े मामले की सुनवाई 13 मार्च को होगी।




जोधपुर हाईकोर्ट के निर्देश पर बरड़वा थाना पुलिस ने सीआरपीएफ की मदद से जम्मू कश्मीर में शकीला की तलाश की, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। पुलिस ने अनंतनाग सहित कई स्थानों पर सर्च अभियान चलाए। न तो शकीला मिली और न ही शब्बीर अहमद खान का कोई
पता चल पाया।




जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर हाईकोर्ट में शब्बीर अहमद खान ने याचिका दायर की। उसने शकीला को अपनी पत्नी बताते हुए दोनों की सुरक्षा की मांग की है। उन्होंने अदालत में निकाहनामा पेश किया, जिसमें दावा किया कि 12 जून 2024 को दोनों का निकाह हुआ था। याचिका में कहा कि उनके परिजन इस निकाह को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें सुरक्षा दी जाए। श्रीनगर हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को आवश्यक निर्देश भी दिए
हैं।




जितेंद्र के अनुसार, वह एक कंपनी में ठेके पर काम करने जम्मू गए थे। वहां शकीला से नजदीकियां बढ़ीं। परिवार की सहमति से दोनों ने फिरोजपुर (पंजाब) में शादी की और साथ रहने लगे। बाद में शकीला के परिजनों ने उसकी गुमशुदगी दर्ज करा दी।




इसके बाद जम्मू पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया और शकीला को जम्मू ले गई। वहां शकीला ने उसके खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। फिर भी उसे साथ नहीं भेजा गया। इसके बाद जितेंद्र ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।



 राजस्थान हाईकोर्ट ने पहली बार 30 अक्टूबर 2025 को सुनवाई की थी। इसी दिन कोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर अगली पेशी पर युवती को पेश करने का निर्देश दिया था। 30 अक्टूबर 2025 से 23 फरवरी 2026 के बीच इस मामले की सुनवाई 7 अलग-अलग तारीखों पर हुई है।



सबसे ताजा आदेश 23 फरवरी 2026 का है, जिसमें सरकारी वकील ने युवती को खोजने के लिए कोर्ट से थोड़ा और समय मांगा। इसके बाद जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च 2026 तय की।




29 जनवरी 2026 को जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया था कि वह उस इलाके में तैनात सीआरपीएफ और अन्य अर्द्धसैनिक बलों (पैरा मिलिट्री फोर्सेज) की मदद लेकर युवती को खोजें।
जम्मू में जॉब के दौरान हुई थी मुलाकात जितेंद्र सिंह ने बताया- साल 2023 में मैं जम्मू में एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में बतौर साइट मैनेजर पोस्टेड थे। 



कंपनी में जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के हैसिदार गांव की रहने वाली शकीला की मां रेशमा भी काम करती थी। मेरी उससे जान-पहचान हो गई थी। रेशमा जम्मू
में ही किराए के मकान में अपने पति मोहम्मद इकबाल बुमला और दो बेटियों के साथ रहती थी। 




जितेंद्र सिंह बताते हैं कि मैं कभी-कभी रेशमा के घर उसके परिवार वालों से मिलने जाता था। इसी दौरान शकीला से दोस्ती बढ़ी।
धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदल गई। इस बीच इस बात की जानकारी शकीला के पिता मोहम्मद इकबाल और मां रेशमा को भी लग गई थी। पहले तो वो नाराज हुए, लेकिन बाद में उन्होंने हमारे रिश्ते पर चुप्पी साध ली।
अब मैं और शकीला एक तरह से एक साथ लिव इन में रहने गए थे। इस दौरान मैंने शकीला की माता और पिता जरुरत पड़ने पर तकरीबन 6 लाख रुपए देकर आर्थिक मदद भी की ।




करीब दो साल बाद मैंने और शकीला ने शादी कर राजस्थान में अपने घर शिफ्ट होने का डिसीजन लिया। हमने 16 फरवरी 2025 को फिरोजपुर (पंजाब) के एक मंदिर में शादी की।