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शनिवार, 6 अप्रैल 2019

30 साल बाद नागौर में गठबंधन का दोहराया जा रहा है इतिहास,साथी रहे नाथूराम मिर्धा व रामदेव बरणगांव के वंशज ज्योति मिर्धा हनुमान बेनीवाल अब आमने सामने है..

30 साल बाद नागौर में गठबंधन का दोहराया जा रहा है इतिहास, साथी रहे नाथूराम मिर्धा व रामदेव बरणगांव के वंशज ज्योति मिर्धा हनुमान बेनीवाल अबआमने सामने है..



भाजपा का आरएलपी के साथ गठबंधन होने से नागौर संसदीय क्षेत्र प्रदेश की वर्तमान में सबसे हॉट सीट बन गई है। करीब 30 साल बाद  नागौर में  गठबंधन का इतिहास  दोहराया जा रहा है। 30 साल पूर्व गठबंधन में साथी रहे नाथूराम मिर्धा व रामदेव बेनीवाल के वंशज आमने सामने है। इन दोनों में से दिल्ली की सत्ता पर कौन काबिज होगा वह नागौर के मतदाता तय करेंगे। 30 साल पुराना जीत का इतिहास भाजपा दोहरा पाएगी या कांग्रेस उस इतिहास को पलट कर रख देगी।


आरएलपी और भाजपा में गठबंधन के बाद प्रदेश की सियासत का मिजाज बदल चुका है। दूसरी ओर पचायत राज स्थापना की नीव रखने वाले नागौर संसदीय क्षेत्र के इतिहास पर गौर करे तो ऐसा पहली बार नही हुआ है। नागौर संसदीय क्षेत्र राजनीति की एक प्रयोगशाला रहा है। यहां ऐसे प्रयोग बार बार होते रहे है। पहले भी यहां गठबंधन हो चुके है। लोकसभा सीट के लिए भारतीय जनता पार्टी ने दूसरी बार गठबंधन उम्मीदवार के लिए सीट छोड़ी है। इससे पहले भाजपा ने यह प्रयोग 1980 में संगठन की स्थापना के बाद हुए दूसरे चुनाव में 1989 में किया था। नागौर संसदीय सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी को हराने के लिए भाजपा ने 1989 के संसदीय चुनाव में जनता दल उम्मीदवार नाथूराम मिर्धा के लिए चुनाव समझौता कर यह सीट छोड़ी थी।


इससे पहले 1984 में हुए चुनाव में नाथूराम मिर्धा इसी सीट से तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री रामनिवास मिर्धा से चुनाव हार गए थे। लेकिन भाजपा से गठबंधन के बाद इस सीट से जनता दल के टिकट पर नाथूराम मिर्धा कांग्रेस प्रत्याशी रामनिवास मिर्धा से जीत गए थे। इस चुनाव के 30 वर्ष बाद भाजपा ने एक बार फिर कांग्रेस प्रत्याशी और नाथूराम मिर्धा की पौत्री डॉ.ज्योति मिर्धा को हराने के लिए राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल के साथ हुए चुनावी गठबंधन में यह सीट छोड़ी है। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व के सामने नागौर संसदीय सीट प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी हुई थी।


कांग्रेस की डॉ.ज्योति मिर्धा को प्रत्याशी घोषित करने के बाद एक सप्ताह के मंथन के बाद यह सीट गठबंधन में देने का निर्णय केन्द्रीय नेतृत्व ने किया। एक बार फिर इस सीट पर चुनावी दंगल इसलिए भी रौचक हो गया है कि ज्योति मिर्धा के दादा नाथूराम मिर्धा और हनुमान बेनीवाल के पिता रामदेव चौधरी 1989 तक एक ही पार्टी में रहे थे। छात्र नेता से विधायक बनने तक के सफर में हनुमान बेनीवाल का कांग्रेस के विरोध में रहना भी भाजपा का बेनीवाल के लिए गठबंधन में सीट छोडऩा एक कारण रहा।लेकिन क्या इस बार का गठबंधन नागौर के भाजपा के लिए नया प्रयोग है?



गौरतलब है कि नागौर संसदीय क्षैत्र मे आठ विधानसभा क्षैत्रो मे 19 लाख 13 हजार 046 कूल मतदाता है जिसमे  9 लाख 95 हजार 101 पुरुष मतदाता है तो 9 लाख 17 हजार 945 महिला मतदाता है। अब युवा मतदाताओं का झुकाव किस तरफ ज्यादा रहेगा। उसी पार्टी की स्थिति लोकसभा चुनाव में मजबूत रहेगी वर्तमान आंकड़ों की अगर बात करें 62 हजार 843 मतदाता 18 से 19 वर्ष के युवा मतदाता हैं। साथ ही 12 लाख 46 हजार 681 ऐसे मतदाता है जो 40 साल की कम उम्र के मतदाता हैं।  काग्रेस की उम्मीदवार डॉ ज्योति मिर्धा और NDA के उम्मीदवार हनुमान बेनिवाल दोनो ही युवाओ की पहली पसंद है।



अगर 2014 के आकडों पर गौर करे तो भारतीय जनता पार्टी के सी.आर. चौधरी 4 लाख 14 हजार 791 वोट मिले तो कांग्रेस की डॉक्टर ज्योति मिर्धा को 3 लाख 39 हजार 573 वोट लेकर दुसरे नम्बर पर रही वही निर्दलीय ताल ठोक रहे हनुमान बेनीवाल को  1 लाख 59 हजार 980 वोट लेकर तीसरे नम्बर पर रहे। भारतीय जनता पार्टी 75 हजार 218 मतों से विजय रही थी और सीआर चौधरी सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे और मोदी सरकार में मंत्री बनें।



 इस बार भारतीय जनता पार्टी में अंदरूनी कलह की वजह से सीआर चौधरी का टिकट काटकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी से राजस्थान में गठबंधन करके आरएलपी के संयोजक हनुमान बेनीवाल पर भरोसा जताते हुए नागौर संसदीय सीट पर बीजेपी ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारा और दांव हनुमान बेनीवाल पर खेला है।

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