दवाई से ज्यादा जीवन रक्षक बना दारू !
आज एससी एसटी एक्ट में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ हुए प्रदर्शन के तहत आज नागौर में अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली। किसी आंदोलन में पहली बार इमरजेंसी सेवाओं के तहत आने वाली मेडिकल सेवा को भी प्रभावित किया गया। जहां भी मेडिकल दुकानें खुली मिली उनमें तोड़फोड़ की कोशिश की गई। पुराने हॉस्पिटल व आजाद चौक स्थित मेडिकल दुकानों में तोड़फोड़ कर नुकसान पहुंचाया गया वही नागौर शहर में शराब की दुकानें बिना रोक-टोक के अनवरत खुली रही। हजारों प्रदर्शनकारियों में से किसी ने भी दारू की दुकान को बंद कराने की कोशिश नहीं की थी।
आज के आंदोलन को देखते हुए दिमाग यही कचोट रहा है कि आखिर ऐसे हिंसात्मक आंदोलन की क्या जरूरत पड़ गई। आगामी कर्नाटक चुनाव के बाद राजस्थान मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। कहीं इन चुनाव के मद्देनजर तो दलित समाज मोहरा नहीं बन गया है। इनका रिमोट कहीं और से संचालित तो नहीं हो रहा था। जिन राज्यों में हिंसात्मक आंदोलन हुए उन राज्यों की मुख्यमंत्रियों ने लगता है ठीक से होमवर्क नहीं किया । पुलिस प्रशासन ने भी आंदोलन को हल्के में आने की कोशिश की?


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