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रविवार, 4 फ़रवरी 2018

ऐसा क्या हुआ कि घड़ियां बन चुकी है नागौर शहर की बदनामी का सबब..

32 वर्षों से आखिर क्यों खामोश है नागौर शहर के घंटाघर की घड़ियां, जनता मांग रही है नगर परिषद से जवाब ...

बिना घड़ियों के घंटाघर?केवल नाम का ही घंटाघर है!

जापान में रहने वाले प्रवासी चौधरी परिवार की कीमती घड़ियां मिल गई मिट्टी में!

शहर के 3 किमी क्षेत्र में सुनाई देती थी इसकी टंकार,,

नगर पालिका से नगर परिषद में क्रमोन्नत हुई यहां की नगर निकाय क्या इतनी भी सक्षम नहीं है कि देसी घड़ियां लगवा कर घंटाघर का सौंदर्यकरण कर सके?


नागौर शहर के गांधी चौक स्थित घंटाघर का निर्माण वर्ष 1982 में तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष दामोदर दास आचार्य ने प्रस्ताव लेकर त्रिपोलिया पर घंटा घर बनाने की योजना बनाई थी। राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री रहे दामोदर दास आचार्य उस समय नगर पालिका अध्यक्ष थे । उन्होंने नगर का सौंदर्यकरण करने के लिए त्रिपोलिया के ऊपर एक घंटाघर निर्माण कराने की ठानी। जब घंटाघर का निर्माण शुरू हुआ तो लोगों ने विरोध भी किया । मगर निर्माण होने के बाद त्रिपोलिया की सुंदरता में और निखार आया और आज यह घंटाघर नागौर की शान बना हुआ है। दूर दराज से आने वाले देसी- विदेशी सैलानी त्रिपोलिया एवं घंटाघर को अपने कैमरे में कैद करने से नहीं चूकते । घंटाघर के निर्माण के दौरान ही जापान में रहने वाले प्रवासी चौधरी परिवार ने घंटाघर के लिए कीमती जापानी घड़ियां भेजी। स्थानीय रतन बहन राजमल चौधरी स्कूल का निर्माण कराने वाले चौधरी परिवार ने इस निर्माण के प्रति रुचि दिखाई थी। इसके लिए वर्ष 1982 में घङियां भेजी गई । घड़ियों की कीमत करीब 7 लाख रूपए थी। घंटाघर निर्माण के बाद वर्ष 1985 में दिवाली के दिन यह घड़ियां लगाकर चालू की गई, यह चालू तो हो गई मगर समय सही नहीं बता पा रही थी। घड़ी कुछ दिन चलकर बंद हो गई इसको एक दो बार ठीक कराने कोशिश की गई लेकिन आज तक ठीक नहीं हो पाई।
बताया जाता है कि घंटाघर की घड़ियों को सेट करने के लिए जोधपुर से घड़ीसाज को बुलाया गया था। करीब सप्ताह भर की मेहनत के बाद ये घड़ियां चालू हो गई थी, जिसकी घंटे पूरे शहर में सुनाई देती थी। इससे लोगों में हर्ष और उल्लास हुआ , लेकिन इन घड़ियों से निकलने वाली घंटिया समय के हिसाब से नहीं बज पाई ।काफी मेहनत के बाद भी यह सही नहीं होने पर घड़ीसाज थक हारकर चला गया। इसके बाद नगरपालिका प्रशासन इस ओर झांक कर भी नहीं देखा। कई वर्षों बाद घड़ियों को ठीक करने के लिए अजमेर से लक्ष्मीनारायण कमोद नामक घड़ीसाज ने सही फिटिंग का आश्वासन दिया लेकिन तत्कालीन अध्यक्ष एवं अधिकारी तैयार नहीं हुए। फिर किसी जोधपुर के एक व्यक्ति को 15 हजार देकर घंटाघर की गाड़ियों की फिटिंग करवाई गई, चालू भी हुई लेकिन घड़ी की 2 टंकारों से अधिक आवाज नहीं हो पाई। 

    जानकार लोगों का कहना है की इस गाड़ी का पूरा सामान आया था, जिसमें 4 बड़े डायल ,एक एंपलीफायर ,एक मास्टर क्लॉक , 4 स्पीकर, कंट्रोल बोर्ड पूरे सिस्टम के साथ अलग से था।  इसके अलावा सिस्टम पावर सप्लाई ,1 चार्जज बैटरी ,एक हेड माइक आदि सामान था । यह सामान अब कहां है किसी को कुछ नहीं मालूम । घंटाघर पर घड़ी के खाली केस तीन दिशाओं में नजर आते हैं । यह घड़ी जब चालू हुई थी उस समय इसकी आवाज शहर के अधिकांश भाग  सहित आसपास के गांवों तक सुनाई देती थी। वर्ष 1987 में  नागौर का एक तकनीशियन नगरपालिका के तत्कालीन प्रशासक  से मिला था उन्होंने कहा कि घडियों के पूर्जे सलामत है तो मैं ठीक कर सकता हूं,इस पर भी काफी खर्च किया। जापानी घड़ियों के ठीक नहीं होने पर 17 वर्ष बाद सन 2002 में लोगों की मांग पर नगरपालिका प्रशासन ने ₹80 हजार खर्च कर अहमदाबाद से 4 देसी घड़ियां मंगाकर लगवाई थी, जो 6 माह में ही बंद हो गई जो आज तक बंध पडी है।
वैसे आधुनिक आज के जमाने में इन गाड़ियों का महत्व नहीं रहा है ,मोबाइल सहित अनेक गैजेट्स टाइम देखने के लिए हर आम आदमी के पास मौजूद है । लेकिन शहर का सौंदर्यकरण कर रहे इस घंटाघर पर बंद घड़ियों को देखकर देसी विदेशी पर्यटक स्थानीय प्रशासन पर गलत कॉमेंट्स करके जाते हैं। जो यहां के लोगों को ठेस पहुंचा रहा है । आज के वर्तमान नगरपरिषद के पास इस घंटाघर की घड़ियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है, ना ही इस पर नई घड़ियां लगाने का कोई विचार या योजना है। 

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