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सोमवार, 2 जनवरी 2023

जनवरी 02, 2023

नोटबंदी Demonetisation पर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट की मिली क्लीन चिट

नोटबंदी Demonetisation पर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट की मिली क्लीन चिट



नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार के 2016 में 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने के फैसले को बरकरार रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार की नोटबंदी को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया. जस्टिस अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कि आर्थिक फैसलों को बदला नहीं जा सकता.


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी से पहले केंद्र और आरबीआई के बीच सलाह-मशविरा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि नोटबंदी का फैसला लेते समय अपनाई गई प्रक्रिया में कोई कमी नहीं थी. इसलिए, उस अधिसूचना को रद्द करने की कोई जरूरत नहीं है. इससे पहले जस्टिस अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने पांच दिन की बहस के बाद 7 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. 


फैसला सुनाने वाली बेंच में जस्टिस अब्दुल नजीर, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस  ए.एस. बोपन्ना, जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन, और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना शामिल रहे. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि मैं साथी जजों से सहमत हूं लेकिन मेरे तर्क अलग हैं. मैं सभी 6 सवालों के अलग जवाब दिए हैं. मैंने आरबीआई के महत्व और उसके अधिनियम और देश की आर्थिक नीतियों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा, भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था की दीवार है. 


मैंने दुनिया भर में इस तरह की विमुद्रीकरण कवायद के इतिहास का हवाला दिया है. उन्होंने कहा कि हमें आर्थिक या वित्तीय निर्णय के गुण दोष नहीं निकालने हैं. केंद्र से सिफारिश करने के लिए आरबीआई अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किया गया. आरबीआई की केंद्रीय बोर्ड की बैठक में निर्धारित कोरम पूरा किया गया था, जिसने सिफारिश करने का फैसला किया गया था. लोगों को कई मौके दिए गए, पैसों को बदलने के लिए बड़े स्तर पर व्यवस्था की गई थी.


केंद्र सरकार ने क्या कहा-

केंद्र ने याचिकाओं के जवाब में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जाली नोटों, बेहिसाब धन और आतंकवाद जैसी गतिविधियों से लड़ने के लिए नोटबंदी एक अहम कदम था. नोटबंदी को अन्य सभी संबंधित आर्थिक नीतिगत उपायों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए या इसकी जांच नहीं की जानी चाहिए. आर्थिक व्यवस्था को पहुंचे बहुत बड़े लाभ और लोगों को एक बार हुई तकलीफ की तुलना नहीं की जा सकती. नोटबंदी ने नकली करंसी को सिस्टम से काफी हद तक बाहर कर दिया. नोटबंदी से डिजिटल अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचा है.

गुरुवार, 19 मई 2022

मई 19, 2022

कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू को 1 साल कठोर कारावास की सजा, 34 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जानिए गुरु ने आखिर क्या किया था?

कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू को 1 साल कठोर कारावास की सजा, 34 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जानिए गुरु ने आखिर क्या किया था? 



नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व बल्लेबाज और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिंद्धू (Navjot Singh Sidhu) सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका मिला है.  रोड रेज मामले में एक साल कैद की बा मशक्कत यानी सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई है। दरअसल मामला 34 साल पुराना है। 27 दिसंबर 1988 को पटियाला में एक विवाद हुआ था। 

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यह विवाद पार्किंग को लेकर था। जब पीड़ित और दो अन्य बैंक से पैसा निकालने के लिए जा रहे थे, सड़क पर जिप्सी देखकर सिद्धू से उसे हटाने को कहा। यहीं बहसबाजी शुरू हो गई। पुलिस का आरोप था कि इस दौरान सिद्धू ने पीड़ित के साथ मारपीट की और मौके से फरार हो गए। पीड़ित को अस्पताल ले जाने पर मृत घोषित कर दिया गया।


दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपना पुराना आदेश संशोधित कर दिया है. पहले सिद्धू को सिर्फ 1000 रुपये जुर्माने की सज़ा मिली थी. रोडरेज का यह मामला 1988 का है. तब सिद्धू के हाथों पिटाई के बाद एक बुजुर्ग की मौत हुई थी.



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पंजाब के पटियाला में 1988 में हुई इस घटना में गुरनाम सिंह नाम के शख्स की मौत हो गई थी. सिद्धू और उनके दोस्त कंवर सिंह संधू को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए 3-3 साल की सज़ा दी थी. लेकिन जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संधू को पूरी तरह बरी कर दिया. जबकि सिद्धू को सिर्फ मारपीट का दोषी माना और सिर्फ 1 हज़ार रुपए जुर्माने की सज़ा दी.

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इसके खिलाफ गुरनाम सिंह के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. परिवार ने फैसले पर पुनर्विचार की मांग की. 13 सितंबर 2018 को कोर्ट ने याचिका को विचार के लिए स्वीकार किया. लेकिन तब कोर्ट यह साफ कर किया था कि वह सिर्फ सज़ा बढ़ाने की मांग पर विचार करेगा. इसका मतलब यह था कि सिद्धू पर गैर इरादतन हत्या के आरोप में दोबारा सुनवाई नहीं होगी.



सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में दिए फैसले में सिद्धू को सिर्फ मारपीट के मामलों में लगने वाली IPC की धारा 323 के तहत दोषी माना था. कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते समय कह दिया था कि बस इसी धारा में सजा बढ़ाने की मांग पर विचार होगा. अब कोर्ट ने इस धारा में मिलने वाली अधिकतम 1 साल की सज़ा सिद्धू को दी है.