मंडी में टूट गई किसान की सांसें: गेहूं की कम कीमत सुनते ही हार्ट अटैक
मंडी में टूट गई किसान की सांसें: गेहूं की कम कीमत सुनते ही हार्ट अटैक
कभी-कभी मौत अचानक नहीं आती, वह धीरे-धीरे बनती है—कर्ज की चिंता से, फसल की बर्बादी से, और उस उम्मीद के टूटने से जो किसान हर मौसम में बोता है। कोटा की भामाशाह मंडी में बुधवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक किसान की मौत नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष की कहानी थी जो हर सीजन खेतों में शुरू होती है और कई बार मंडी में आकर टूट जाती है।
गांव झाड़आमली निवासी 54 वर्षीय किसान हंसराज वैष्णव सुबह करीब चार बजे पिकअप में गेहूं भरकर घर से निकले थे। उम्मीद थी कि आज मंडी में फसल बिकेगी तो कुछ कर्ज उतरेगा, घर का खर्च चलेगा और शायद थोड़ी राहत भी मिलेगी। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिख रखा था।
सुबह करीब 11 बजे जब वे मंडी यार्ड में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, तभी नीलामी में गेहूं की कीमत उम्मीद से बहुत कम लगी। बताया जा रहा है कि यह सुनते ही हंसराज गहरे तनाव में आ गए। कुछ ही देर बाद वे अचानक अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। आसपास मौजूद लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
हंसराज वैष्णव की कहानी उन हजारों किसानों जैसी है जो अपनी छोटी जमीन के सहारे खेती नहीं चला पाते और फिर किराए पर जमीन लेकर खेती करते हैं। परिवार के अनुसार हंसराज के पास खुद की करीब चार बीघा जमीन थी, लेकिन उन्होंने इस बार दस बीघा जमीन लीज पर लेकर गेहूं की फसल बोई थी। खेती में उम्मीद बड़ी थी, लेकिन मौसम ने साथ नहीं दिया।
हाल ही में हुई बारिश और ओलावृष्टि ने गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा दिया। जो फसल बची, उसे बेचने के लिए वे मंडी पहुंचे थे। परिवार के भांजे प्रवीण के मुताबिक हंसराज पहले से ही आर्थिक दबाव में थे। पिछले साल सोयाबीन की फसल भी खराब हो गई थी और उनके ऊपर करीब आठ लाख रुपये का कर्ज हो गया था।
बेटे अजय के अनुसार पिता अक्सर कर्ज की चिंता में रहते थे। कई लोगों के उधार और खेती के खर्च ने उन्हें परेशान कर रखा था। मंडी में कम कीमत की खबर शायद उनके लिए आखिरी झटका साबित हुई।
अनंतपुरा थाना के एएसआई धमंडी लाल ने बताया कि किसान मंडी में फसल बेचने आए थे और वहीं अचेत होकर गिर गए। पोस्टमॉर्टम के बाद ही मौत का सही कारण सामने आएगा, लेकिन जो लोग उस वक्त वहां मौजूद थे, वे कहते हैं कि किसान की चिंता उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।
मंडी में ढेरियों के बीच एक किसान की जिंदगी चुपचाप खत्म हो गई। यह घटना सिर्फ कोटा की एक मंडी की नहीं है। यह उस सवाल की भी है जो हर साल फसल कटने के बाद उठता है। क्या किसान के हिस्से में सिर्फ मेहनत, मौसम का डर और बाजार की अनिश्चितता ही बची है? हंसराज वैष्णव सुबह उम्मीद लेकर मंडी पहुंचे थे। दोपहर होते-होते उनकी जिंदगी खत्म हो गई। पीछे रह गया एक परिवार, कर्ज का बोझ और वह सवाल जो हर किसान की आंखों में छुपा रहता है, क्या मेहनत की सही कीमत कभी मिलेगी?







